कोयले की राजनीति में उलझा झरिया, विकास की राह अब भी धुंधली
कन्हैया कुमार /धनबाद
धनबाद :- धनबाद को यूं ही कोयले की राजधानी नहीं कहा जाता। इस धरती ने देश को कोयला दिया, उद्योगों को ऊर्जा दी और हजारों परिवारों को रोजगार दिया। लेकिन इसी कोयले ने धनबाद, खासकर झरिया को संघर्ष, विस्थापन, प्रदूषण और राजनीति की ऐसी विरासत भी दी, जिसका असर आज तक दिखाई देता है। झरिया की राजनीति का इतिहास देखें तो यहां सत्ता की लड़ाई केवल चुनावी समीकरणों तक सीमित नहीं रही, बल्कि कोयला मजदूरों, श्रमिक संगठनों और प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों के इर्द-गिर्द भी घूमती रही है।
झरिया विधानसभा क्षेत्र का गठन 1967 में हुआ और पहले चुनाव में कांग्रेस के शिवराज प्रसाद ने जीत दर्ज की। इसके बाद 1970 और 1980 के दशकों में झरिया की राजनीति पर मजदूर नेता सूर्यदेव सिंह का प्रभाव स्थापित हुआ। उनके बाद परिवार के विभिन्न सदस्यों ने भी इस राजनीतिक प्रभाव को आगे बढ़ाया। 2000 के बाद भाजपा के साथ इस परिवार की राजनीतिक पकड़ और मजबूत हुई। वर्ष 2014 में संजीव सिंह ने भाजपा के टिकट पर झरिया से जीत हासिल की। हालांकि 2019 में कांग्रेस की पूर्णिमा नीरज सिंह ने भाजपा की रागिनी सिंह को हराकर इस राजनीतिक समीकरण में बड़ा बदलाव किया।
2019 का चुनाव झरिया की राजनीति के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक प्रभाव को पहली बार बड़ी चुनौती मिली। पूर्णिमा नीरज सिंह को 79,786 वोट मिले, जबकि रागिनी सिंह को 67,732 वोट प्राप्त हुए। इसके बाद झरिया में विकास कार्यों को लेकर कांग्रेस विधायक के कार्यकाल की चर्चा होने लगी। समर्थकों का दावा रहा कि विधायक के कार्यकाल में कई करोड़ रुपये की योजनाएं स्वीकृत हुईं और सड़क, नाली, सामुदायिक भवन सहित विभिन्न विकास योजनाओं को आगे बढ़ाया गया। हालांकि इन दावों का मूल्यांकन धरातल पर योजनाओं की गुणवत्ता, पूर्णता और जनता को मिले वास्तविक लाभ के आधार पर किया जाना चाहिए।
इसके बाद 2024 के विधानसभा चुनाव ने एक बार फिर झरिया की राजनीतिक तस्वीर बदल दी। भाजपा की रागिनी सिंह ने कांग्रेस की पूर्णिमा नीरज सिंह को 14,511 वोटों के अंतर से हराया। रागिनी सिंह को 87,892 वोट मिले, जबकि पूर्णिमा नीरज सिंह को 73,381 वोट प्राप्त हुए। यानी 2019 में मिली हार के बाद भाजपा ने दोबारा झरिया विधानसभा सीट पर कब्जा कर लिया।
लेकिन असली सवाल चुनाव जीतने के बाद शुरू होता है—झरिया को मिला क्या?
झरिया की जनता के सामने आज भी सबसे बड़ी चुनौती जमीन के नीचे जलती आग और जमीन के ऊपर मौजूद समस्याएं हैं। भूमिगत आग, भू-धंसान, जहरीली गैस, प्रदूषण, पेयजल, बिजली, सड़क और पुनर्वास जैसे मुद्दे वर्षों से यहां के लोगों के जीवन का हिस्सा बने हुए हैं। केंद्र सरकार ने जून 2025 में संशोधित झरिया मास्टर प्लान को मंजूरी देते हुए आग, भू-धंसान और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए करोड़ों
रुपये के वित्तीय प्रावधान को मंजूरी दी थी। इसका उद्देश्य सबसे संवेदनशील इलाकों को प्राथमिकता देते हुए आग और भू-धंसान से निपटना तथा प्रभावित परिवारों का पुनर्वास करना है।
इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर जनता की शिकायतें यह सवाल खड़ा करती हैं कि बड़ी योजनाओं और सरकारी घोषणाओं का लाभ आम आदमी तक कितनी तेजी से पहुंच रहा है। झरिया का नागरिक आज भी पूछ रहा है—क्या विकास का मतलब सिर्फ नई योजनाओं की घोषणा है या फिर उन योजनाओं का समय पर जमीन पर उतरना भी जरूरी है?
2024 में रागिनी सिंह के विधायक बनने के बाद जनता की उम्मीदें इसलिए भी बढ़ीं क्योंकि झरिया में सत्ता का समीकरण एक बार फिर सिंह परिवार के पक्ष में दिखाई दिया। लोगों को उम्मीद थी कि राजनीतिक अनुभव और प्रशासनिक स्तर पर प्रभाव का फायदा झरिया के विकास को मिलेगा। लेकिन लगभग दो वर्ष के इस कार्यकाल को लेकर अब राजनीतिक बहस तेज होनी स्वाभाविक है कि जिन मूल समस्याओं को लेकर जनता वर्षों से परेशान है, उनमें कितना ठोस बदलाव आया।
यहीं से झरिया की राजनीति का एक और महत्वपूर्ण अध्याय सामने आता है।
2026 में धनबाद नगर निगम चुनाव में भाजपा ने संजीव कुमार को महापौर पद का प्रत्याशी बनाया, जबकि दूसरी ओर रागिनी सिंह के पति संजीव सिंह ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा। चुनाव परिणाम ने भाजपा के राजनीतिक समीकरण को झरिया के संदर्भ में एक अलग संदेश दिया। संजीव सिंह की जीत ने यह सवाल खड़ा किया कि झरिया और धनबाद की राजनीति में व्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव कितना मजबूत है और पार्टी संगठन की भूमिका कितनी निर्णायक है।
हालांकि यह कहना कि किसी एक व्यक्ति या परिवार के कारण किसी प्रत्याशी को नुकसान या फायदा हुआ, राजनीतिक विश्लेषण का विषय है और इसे प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। लेकिन चुनाव परिणाम ने इतना जरूर दिखाया कि झरिया में राजनीतिक परिवारों का प्रभाव, व्यक्तिगत संपर्क और स्थानीय समीकरण आज भी बेहद महत्वपूर्ण हैं।
अब स्थिति यह है कि एक ही परिवार से विधानसभा और नगर निगम की राजनीति में प्रभावशाली प्रतिनिधित्व होने के कारण झरिया की जनता की अपेक्षाएं और बढ़ गई हैं। आम लोगों की उम्मीद स्वाभाविक है कि अगर विधायक और महापौर स्तर पर राजनीतिक समन्वय मजबूत है तो इसका सीधा लाभ झरिया को मिलना चाहिए। पानी, बिजली, सड़क, नाली, सफाई, प्रदूषण और अग्नि प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा जैसे मुद्दों पर तेजी से काम होना चाहिए।
लेकिन राजनीति के इस पूरे अध्याय का सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या झरिया का विकास राजनीतिक समीकरणों से ऊपर उठ पाएगा?
झरिया को केवल चुनावी सीट के रूप में देखने से समस्या का समाधान नहीं होगा। यह देश के सबसे महत्वपूर्ण कोयला क्षेत्रों में से एक है, लेकिन यहां रहने वाले लोगों को विकास के साथ सुरक्षित जीवन का अधिकार भी चाहिए। जिस इलाके की जमीन के नीचे दशकों से आग जल रही हो, वहां केवल सड़क और नाली बनाना पर्याप्त नहीं है। पुनर्वास, रोजगार, स्वास्थ्य, पेयजल, प्रदूषण नियंत्रण और सुरक्षित आवास को एक साथ लेकर चलना होगा।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो झरिया की जनता ने पिछले कुछ चुनावों में सत्ता परिवर्तन के जरिए साफ संदेश दिया है कि वह किसी एक राजनीतिक दल की स्थायी जागीर नहीं है। 2014 में भाजपा, 2019 में कांग्रेस और 2024 में फिर भाजपा की जीत बताती है कि मतदाता अपने मुद्दों और परिस्थितियों के आधार पर फैसला बदल सकता है।
इसलिए वर्तमान विधायक के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष को जवाब देना नहीं, बल्कि जनता को जवाब देना है। आने वाले समय में यह तय करेगा कि रागिनी सिंह का कार्यकाल केवल राजनीतिक वापसी के रूप में याद किया जाएगा या झरिया के विकास में ठोस बदलाव लाने वाले दौर के रूप में।
झरिया की जनता अब भाषण नहीं, परिणाम चाहती है। भूमिगत आग से लेकर पेयजल तक, प्रदूषण से लेकर सड़क तक और पुनर्वास से लेकर रोजगार तक—हर मोर्चे पर धरातल पर बदलाव की जरूरत है।
बहरहाल, झरिया की राजनीति में कोयला आज भी सबसे बड़ा मुद्दा है, लेकिन अब जनता शायद कोयले की राजनीति से आगे विकास की राजनीति देखना चाहती है। जमीन के नीचे की आग कब बुझेगी, यह तो भविष्य बताएगा; लेकिन जमीन के ऊपर विकास की रोशनी कब पहुंचेगी, इसका जवाब जनता अपने जनप्रतिनिधियों से आज ही मांग रही है।
