धनबाद का विकास रील में या वास्तविकता में? जनप्रतिनिधियों की सोशल मीडिया सक्रियता पर उठे सवाल
कन्हैया कुमार/धनबाद
धनबाद: धनबाद का विकास आखिर रील में हो रहा है या वास्तविक धरातल पर, यह सवाल अब शहरवासियों के बीच चर्चा का विषय बनता जा रहा है। चुनाव के दौरान जनता से विकास के बड़े-बड़े वादे किए गए। जनता ने भरोसा जताते हुए अपने प्रतिनिधियों को चुनकर जिम्मेदारी सौंपी। लेकिन चुनाव के कई महीने बाद अब लोग विकास कार्यों की जमीनी स्थिति जानना चाहते हैं।
हालांकि, सोशल मीडिया पर नजर डालें तो तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। शहर के विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जनप्रतिनिधियों की सक्रियता स्पष्ट नजर आती है। कहीं वैवाहिक कार्यक्रमों की तस्वीरें हैं, कहीं अपने शक्ति प्रदर्शन का वीडियो, कहीं जनता के बीच मौजूदगी और कहीं कैमरे के सामने गाड़ियों के काफिले।
ऐसे में आम जनता का सीधा सवाल है—क्या जनप्रतिनिधियों को जनता ने रील बनाने के लिए चुना है या वास्तविक विकास कराने के लिए?
कैमरे के सामने विकास, जमीन पर इंतजार
धनबाद की सड़कों पर निकलते ही जगह-जगह समस्याएं दिखाई देती हैं। सड़क, नाली, जलजमाव, यातायात, साफ-सफाई और बुनियादी नागरिक सुविधाओं को लेकर लोगों की शिकायतें लगातार सामने आती रहती हैं। कई इलाकों में लोग छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान के लिए लंबे समय से प्रतीक्षा कर रहे हैं।
इसके विपरीत, सोशल मीडिया पर साझा की जाने वाली तस्वीरों से ऐसा प्रतीत होता है मानो विकास कार्य पूरी गति से चल रहे हों।
इसी कारण जनता के बीच यह व्यंग्य भी सुनने को मिल रहा है—
“धनबाद में सड़क भले न बने, लेकिन रील जरूर बन जाती है।”
जनता पूछ रही है—रील की गति तेज, विकास की क्यों धीमी?
जनप्रतिनिधियों की सोशल मीडिया सक्रियता अपने आप में गलत नहीं है। आज के दौर में सोशल मीडिया जनता से संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली सक्रियता और जमीन पर नजर आने वाले विकास के बीच बड़ा अंतर महसूस होने लगे।
जनता चाहती है कि उसके प्रतिनिधि केवल कैमरे के सामने ही नहीं, बल्कि समस्याओं के बीच भी उतनी ही सक्रियता और प्रतिबद्धता के साथ दिखाई दें।
लोगों का कहना है कि यदि किसी सड़क की स्थिति खराब है, तो केवल वीडियो बनाकर समस्या बताने के बजाय यह जानकारी दी जानी चाहिए कि सड़क का निर्माण कब होगा। यदि जलजमाव की समस्या है, तो फोटो खिंचवाने के बजाय जल निकासी की स्थायी व्यवस्था की जानी चाहिए। यदि यातायात व्यवस्था प्रभावित है, तो पोस्ट साझा करने के बजाय उसका समाधान जमीन पर दिखाई देना चाहिए।
क्या विकास की जगह कंटेंट ने ले ली है?
धनबाद की राजनीति में अब एक नया सवाल धीरे-धीरे उभर रहा है—क्या जनप्रतिनिधियों के लिए विकास के साथ-साथ सोशल मीडिया कंटेंट भी प्राथमिकता बन गया है?
आज कोई भी कार्यक्रम हो, कैमरा मौजूद रहता है। तस्वीरें ली जाती हैं, वीडियो बनाए जाते हैं और फिर उन्हें सोशल मीडिया पर साझा कर दिया जाता है। जनता पोस्ट देखती है, प्रतिक्रिया देती है और आगे बढ़ जाती है।
लेकिन वास्तविक परीक्षा सोशल मीडिया की स्क्रीन पर नहीं, बल्कि सड़कों और मोहल्लों में होती है।
जहां गड्ढे हैं, वहां वाहन चालकों को परेशानी होती है। जहां नालियां नहीं हैं, वहां बारिश का पानी घरों तक पहुंच जाता है। जहां यातायात व्यवस्था कमजोर है, वहां लोग जाम में फंसते हैं। और जहां मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, वहां केवल सोशल मीडिया पोस्ट से समस्या का समाधान नहीं होता।
जनता को चाहिए ‘लाइक’ नहीं, जीवन में बदलाव
धनबाद की जनता ने अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुना है कि वे क्षेत्र की समस्याओं को संबंधित विभागों और सरकार के समक्ष प्रभावी ढंग से उठाएं तथा विकास योजनाओं को धरातल पर लागू कराएं।
जनता को सोशल मीडिया पर हजारों लाइक से अधिक अपने मोहल्ले में बेहतर सड़क चाहिए।
उसे वायरल वीडियो से अधिक साफ नालियां चाहिए।
उसे बड़े-बड़े दावों से अधिक नियमित जलापूर्ति चाहिए।
उसे तस्वीरों से अधिक वास्तविक सुविधाएं चाहिए।
यानी जनता का संदेश स्पष्ट है—
“हमें रील नहीं, वास्तविक विकास चाहिए।”
पांच वर्ष की जिम्मेदारी, कुछ महीनों में दिखेगा असर?
यह भी सच है कि विकास कार्यों को पूरा होने में समय लगता है। हर समस्या का समाधान तत्काल संभव नहीं होता। कई योजनाओं में प्रशासनिक प्रक्रियाओं, बजट, निविदा और विभिन्न विभागों की मंजूरी जैसी औपचारिकताएं शामिल होती हैं।
लेकिन जनता यह अवश्य जानना चाहती है कि कौन-सा काम कब शुरू होगा, कब पूरा होगा और उसकी प्राथमिकता क्या है।
यदि जनप्रतिनिधि नियमित रूप से इसकी जानकारी जनता तक पहुंचाएं, तो सोशल मीडिया केवल प्रचार का माध्यम न रहकर जवाबदेही का प्रभावी मंच बन सकता है।
अब जनता दे रही है ‘रील बनाम रियल’ का रिपोर्ट कार्ड
धनबाद में आने वाले दिनों में सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली सक्रियता का कितना हिस्सा धरातल पर विकास में परिवर्तित होता है।
क्योंकि जनता सब देख रही है।
कैमरे के सामने कौन आया, यह भी।
किसने पोस्ट किया, यह भी।
किसने वादा किया, यह भी।
और किस वादे का असर जमीन पर हुआ, यह भी।
इसलिए अब जनप्रतिनिधियों के सामने चुनौती केवल सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने की नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर दिखाई जाने वाली तस्वीरों को जमीनी हकीकत में बदलने की है।
आखिर जनता ने उन्हें रील का नायक बनने के लिए नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र के विकास के लिए जिम्मेदार प्रतिनिधि बनने के लिए चुना है।
अब देखना यह है कि धनबाद की विकास गाथा अगली बार मोबाइल की स्क्रीन पर दिखाई देती है या शहर की सड़कों पर।
