सबका साथ से जो जीते उसका साथ तक: धनबाद का नया राजनीतिक मंत्र
KANHAIYA KUMAR/DHANBAD
धनबाद:- कोयलांचल की राजधानी कहे जाने वाले धनबाद को लंबे समय से राजनीतिक रूप से भाजपा का अभेद्य किला माना जाता रहा है। वजह भी साफ है—शहर में तीन विधायक और एक सांसद भाजपा से, संगठन मजबूत, बूथ स्तर तक नेटवर्क और “गढ़” होने का दावा। लेकिन इस बार नगर निगम चुनाव के नतीजों ने इस दावे की बुनियाद हिला दी। भाजपा समर्थित प्रत्याशी संजीव कुमार न सिर्फ हार गए, बल्कि चौथे स्थान पर खिसक गए। राजनीति में इसे “संदेश” कहा जाता है—और संदेश अक्सर परिणामों से ज्यादा असरदार होता है।
रायशुमारी से शुरू हुई कहानी
चुनाव की घोषणा होते ही मेयर पद के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं ने करीब 15 नामों की सूची सौंपी। इनमें पूर्व विधायक, पूर्व महापौर, छात्र राजनीति से निकले चेहरे और ऐसे नेता भी शामिल थे जिन्होंने सरकार से सीधी टक्कर लेकर अपनी पहचान बनाई थी। कार्यकर्ताओं को उम्मीद थी कि इस बार टिकट किसी ऐसे चेहरे को मिलेगा जिसकी जमीन पर पकड़ हो, पहचान हो और संगठन में स्वीकार्यता हो।
लेकिन हुआ उल्टा। तमाम नामों को किनारे कर एक ऐसे व्यक्ति को टिकट दे दिया गया, जिन्हें आम मतदाता तो दूर, कई बूथ स्तर के कार्यकर्ता भी ठीक से नहीं पहचानते थे। राजनीतिक विश्लेषक इसे “संगठन बनाम निर्णय” का क्लासिक केस बता रहे हैं—जहां कार्यकर्ताओं की राय और शीर्ष नेतृत्व का फैसला अलग-अलग दिशाओं में चले गए।
बगावत की बयार
टिकट घोषणा के बाद पार्टी के भीतर नाराजगी खुलकर सामने आई। कई बड़े चेहरे पार्टी छोड़कर मैदान में उतर गए। चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी की ओर से बागियों पर कार्रवाई की बात भी कही गई, लेकिन मतदाताओं ने अपने तरीके से “कार्रवाई” कर दी।
भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़ रहे संजीव सिंह ने रिकॉर्ड मतों के साथ जीत दर्ज की, जबकि दूसरे स्थान पर रहे चंद्र शेखर अग्रवाल भी भाजपा से अलग होकर मैदान में थे। यानी जनता ने संदेश साफ दिया—टिकट से ज्यादा भरोसा चेहरे और काम पर है।
राजनीतिक गणित का उलटफेर
राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि “संगठन ही शक्ति है।” लेकिन धनबाद के इस चुनाव ने दिखा दिया कि संगठन की ताकत तभी तक है, जब तक वह जमीनी कार्यकर्ताओं की भावनाओं और स्थानीय समीकरणों को समझे।
यहां दिलचस्प पहलू यह भी है कि जिस शहर को भाजपा का गढ़ कहा जाता है, वहीं उसके समर्थित प्रत्याशी को चौथे स्थान पर संतोष करना पड़ा। इससे यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या “गढ़” की परिभाषा बदल रही है? या फिर गढ़ के भीतर ही दरारें पड़ चुकी हैं?
बधाई और भविष्य की राजनीति
चुनाव परिणाम आने के बाद एक और दिलचस्प दृश्य देखने को मिला। भाजपा विधायक राज सिन्हा विजयी प्रत्याशी संजीव सिंह को बधाई देने उनके आवास पहुंचे। राजनीति में इसे “परिपक्वता” कहा जा सकता है, लेकिन स्थानीय गलियारों में इसे भविष्य की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले विधानसभा या लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए अब कोई भी गुट विजयी चेहरे से दूरी बनाकर जोखिम नहीं लेना चाहता। क्योंकि अगर भविष्य में ऐसे चेहरे को दरकिनार किया गया, तो परिणाम और भी अप्रत्याशित हो सकते हैं।
हार का विश्लेषण या होली का रंग?
एक ओर पार्टी हार की समीक्षा में जुटी है, चिंतन-मंथन चल रहा है, कारण खोजे जा रहे हैं—कहां चूक हुई, किस बूथ पर वोट खिसके, किस वार्ड में संगठन कमजोर पड़ा।
लेकिन दूसरी ओर जनप्रतिनिधियों के चेहरों पर शिकन कम और “होलीयाना रंग” ज्यादा नजर आ रहा है। जनता के बीच चर्चा है कि “हार-जीत तो लोकतंत्र का हिस्सा है, जो जीते उन्हीं के साथ।”
“सबका साथ, सबका विकास” का नारा अब “जो जीते, उसका साथ” में तब्दील होता दिख रहा है।
असली चूक कहां हुई?
राजनीतिक विश्लेषण के नजरिए से देखें तो भाजपा की हार के पीछे कई संभावित कारण उभरते हैं—
1. स्थानीय नेतृत्व की अनदेखी: जमीनी कार्यकर्ताओं की राय को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।
2. बगावत का असर: पार्टी से अलग हुए नेताओं ने वोटों में सेंध लगाई।
3. चेहरे की पहचान: मतदाता अब पार्टी से ज्यादा उम्मीदवार के व्यक्तिगत काम और पहुंच को तवज्जो दे रहे हैं।
4. संगठन में असंतोष: टिकट वितरण के बाद जो असंतोष पनपा, वह पूरी तरह शांत नहीं हो पाया।
धनबाद का यह परिणाम सिर्फ एक नगर निगम चुनाव का परिणाम नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि स्थानीय राजनीति में समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। अब मतदाता “ब्रांड” के भरोसे नहीं, बल्कि “ब्रांड एंबेसडर” के काम पर वोट दे रहा है।
राजनीति में हार हमेशा स्थायी नहीं होती, लेकिन उससे मिले संकेत को नजरअंदाज करना महंगा पड़ सकता है। भाजपा के लिए यह चुनाव एक चेतावनी है कि संगठन की मजबूती तभी सार्थक है, जब उसमें संवाद, सम्मान और स्थानीय नेतृत्व की भागीदारी हो।
कोयलांचल की धरती ने इस बार एक दिलचस्प कहानी लिखी है—
जहां गढ़ था, वहां दरार दिखी;
जहां बगावत थी, वहां बहार दिखी;
और जहां हार थी, वहां भी मुस्कान दिखी।
जनता फिलहाल तमाशबीन नहीं, निर्णायक की भूमिका में है। वह देख रही है कि कौन उसकी उम्मीदों पर खरा उतरता है और कौन सिर्फ चुनावी मौसम में नजर आता है।
धनबाद की राजनीति में यह अध्याय भले खत्म हो गया हो, लेकिन इसके असर की गूंज आने वाले चुनावों तक सुनाई देगी। अब देखना यह है कि भाजपा इस संदेश को आत्ममंथन में बदलती है या फिर इसे भी “लोकतंत्र का उत्सव” कहकर रंगों में भुला देती है।
