| | | | | | | | |

धनबाद नगर निकाय चुनाव: भाजपा में बढ़ती बगावत, सियासी समीकरणों में बड़ा उलटफेर

Spread the love

SAMRIDHI RAI/ DHANBAD

धनबाद में नगर निकाय चुनाव की सरगर्मी जैसे-जैसे तेज हो रही है, वैसे-वैसे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि पार्टी की अंदरूनी कलह अब सड़कों और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन चुकी है। महापौर पद के लिए भाजपा द्वारा अपने समर्पित प्रत्याशी की घोषणा के बाद जिस तरह से सक्रिय कार्यकर्ताओं और बड़े चेहरों ने बागी तेवर अपनाए हैं, उसने पार्टी नेतृत्व की रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

भाजपा के लिए सबसे बड़ा झटका तब लगा जब पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व महापौर चंद्रशेखर अग्रवाल ने भाजपा का दामन छोड़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) का हाथ थाम लिया। चंद्रशेखर अग्रवाल लंबे समय से भाजपा का जाना-पहचाना चेहरा रहे हैं और धनबाद की राजनीति में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है। ऐसे में उनका पार्टी छोड़ना सिर्फ एक इस्तीफा नहीं, बल्कि भाजपा के संगठनात्मक ढांचे पर सीधा प्रहार माना जा रहा है।

इसी कड़ी में धनबाद के सफल उद्यमी और चर्चित समाजसेवी शांतनु चंद्रा का नाम भी सामने आया है। भाजपा की सक्रिय सदस्यता से इस्तीफा देकर शांतनु चंद्रा ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। भाजपा में रहते हुए शांतनु चंद्रा ने न सिर्फ संगठन के लिए सक्रिय भूमिका निभाई, बल्कि राज्य सरकार की आरक्षण नीति के खिलाफ अकेले न्यायालय में याचिका दायर कर एक अलग पहचान भी बनाई थी। दलित और वंचित वर्ग के एक बड़े तबके में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। ऐसे में उनका भाजपा से अलग होना पार्टी के लिए सामाजिक समीकरण के लिहाज से भी नुकसानदेह साबित हो सकता है।

भाजपा की परेशानी यहीं खत्म नहीं होती। कोयला मजदूरों के बीच मजबूत पकड़ रखने वाले और भाजपा से कई पीढ़ियों से जुड़े पूर्व विधायक संजीव सिंह ने भी बागी तेवर अपनाते हुए महापौर पद का चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। संजीव सिंह का भाजपा से रिश्ता सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि वैचारिक और पारिवारिक भी रहा है। दिलचस्प बात यह है कि उनकी पत्नी रागनी सिंह वर्तमान में झरिया से भाजपा की विधायक हैं। ऐसे में पति-पत्नी के अलग-अलग राजनीतिक रुख ने भाजपा को असहज स्थिति में डाल दिया है। संजीव सिंह द्वारा बुधवार को नामांकन दाखिल करने की घोषणा ने यह साफ कर दिया है कि भाजपा के भीतर असंतोष अब दबा नहीं रह गया है।

दूसरी ओर, झारखंड मुक्ति मोर्चा भी अपने भीतर उठते सवालों से जूझ रही है। पार्टी ने केंद्रीय सदस्य नीलम मिश्रा को महापौर पद के लिए अपना प्रत्याशी घोषित किया था। घोषणा के बाद से ही नीलम मिश्रा लगातार जनता के बीच जाकर संपर्क अभियान चला रही थीं और स्थानीय समस्याओं को समझने की कोशिश कर रही थीं। लेकिन चंद्रशेखर अग्रवाल के झामुमो में शामिल होने के बाद राजनीतिक अटकलों का बाजार गर्म हो गया है। कयास लगाए जा रहे हैं कि पार्टी नीलम मिश्रा की जगह चंद्रशेखर अग्रवाल को महापौर पद का प्रत्याशी घोषित कर सकती है। यदि ऐसा होता है तो नीलम मिश्रा को अपना नामांकन वापस लेना पड़ सकता है।

इस संभावित बदलाव को लेकर झामुमो के धनबाद महानगर कमिटी ने खुलकर आपत्ति दर्ज कराई है। महानगर कमिटी का कहना है कि नीलम मिश्रा की घोषणा के बाद कार्यकर्ता पूरी ऊर्जा के साथ चुनावी तैयारी में जुट गए थे। अचानक इस तरह के फैसले से न सिर्फ कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटेगा, बल्कि संगठनात्मक अनुशासन पर भी सवाल खड़े होंगे। कमिटी ने स्पष्ट किया है कि इस पूरे मामले को केंद्रीय कमिटी के समक्ष रखा जाएगा और अंतिम निर्णय वहीं से लिया जाना चाहिए।

राजनीतिक विश्लेषण की बात करें तो धनबाद नगर निकाय चुनाव भले ही गैर-दलीय आधार पर हो रहे हों, लेकिन हकीकत यह है कि सभी प्रमुख राजनीतिक दल अपने-अपने समर्पित कार्यकर्ताओं को मैदान में उतारने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा और झामुमो दोनों ही इस चुनाव को प्रतिष्ठा की लड़ाई के रूप में देख रहे हैं। ऐसे में बगावत और अंदरूनी खींचतान का सीधा असर चुनावी परिणामों पर पड़ सकता है।

भाजपा ने समाजसेवी और उद्यमी संजीव अग्रवाल को अपना प्रत्याशी बनाकर मैदान में उतारा है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि संजीव अग्रवाल की साफ-सुथरी छवि और सामाजिक जुड़ाव से चुनाव में फायदा मिलेगा। लेकिन शांतनु चंद्रा और संजीव सिंह जैसे चेहरों की बगावत ने इस रणनीति को कमजोर कर दिया है। पार्टी की रायशुमारी में यह तय हुआ था कि जिस भी प्रत्याशी की घोषणा होगी, सभी कार्यकर्ता एकजुट होकर उसे जिताने में पूरी ताकत लगाएंगे। लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट नजर आ रही है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा के भीतर यह असंतोष टिकट वितरण और निर्णय प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। कई वरिष्ठ और सक्रिय नेताओं को यह महसूस हो रहा है कि उनकी अनदेखी की जा रही है। यही कारण है कि वे या तो पार्टी छोड़ रहे हैं या फिर बगावत का रास्ता अपना रहे हैं। यदि भाजपा समय रहते इस असंतोष को नहीं संभाल पाती है, तो इसका सीधा फायदा विरोधी दलों और निर्दलीय प्रत्याशियों को मिल सकता है।

कुल मिलाकर, धनबाद नगर निकाय चुनाव अब सिर्फ विकास और नगर प्रशासन का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह दलों के भीतर की एकजुटता और नेतृत्व क्षमता की भी परीक्षा बन चुका है। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने बागी नेताओं को मनाना और कार्यकर्ताओं को फिर से एकजुट करना है। वहीं झामुमो के लिए भी प्रत्याशी चयन को लेकर संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भाजपा अपने भीतर उठे इस बवंडर को संभाल पाती है या फिर बागी तेवर चुनावी नतीजों में बड़ा उलटफेर कर देंगे।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *