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धनबाद नगर निगम चुनाव: पूर्व महापौर चंद्र शेखर अग्रवाल के लिए चुनौती भरा होगा यह चुनाव, बदले राजनीतिक समीकरण बढ़ा सकते हैं मुश्किल

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KANHAIYA KUMAR/DHANBAD

धनबाद।धनबाद नगर निगम चुनाव को लेकर इस बार सियासी गलियारों में गहमागहमी तेज़ है। लंबे अंतराल के बाद हो रहे इस चुनाव में न सिर्फ नए चेहरे मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं, बल्कि पुराने दिग्गजों के लिए भी यह चुनाव आसान नहीं रहने वाला। ऐसे में सबसे ज्यादा चर्चा में हैं नगर निगम के पूर्व महापौर चंद्र शेखर अग्रवाल, जिन्हें एक समय धनबाद की राजनीति में मजबूत और प्रभावशाली चेहरा माना जाता था। परंतु इस बार का चुनाव उनके लिए कई मायनों में चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।

भाजपा से बढ़ी दूरी बन सकती है परेशानी

चंद्र शेखर अग्रवाल लंबे समय तक भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से जुड़े रहे हैं और धनबाद नगर निगम के महापौर रहते हुए उन्होंने संगठन और प्रशासन दोनों में अपनी मजबूत पकड़ बनाई थी। लेकिन सूत्रों की मानें तो 2024 के विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा द्वारा उन्हें टिकट न दिए जाने से वे पार्टी से नाराज हो गए थे। नाराजगी का आलम यह था कि उन्होंने चुनाव प्रचार से खुद को पूरी तरह दूर रखा। इस दूरी के कारण अब पार्टी नेतृत्व और अग्रवाल के बीच रिश्तों में ठंडापन साफ देखा जा सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भले ही नगर निगम का चुनाव सीधे तौर पर पार्टी बेस पर नहीं लड़ा जाता, परंतु प्रत्येक उम्मीदवार को अपने राजनीतिक संगठन या समर्थक समूहों का परोक्ष सहयोग अवश्य मिलता है। यही सहयोग चुनावी परिणामों पर निर्णायक असर डालता है। ऐसे में अगर भाजपा संगठन इस बार किसी नए या अलग उम्मीदवार को समर्थन देता है, तो चंद्र शेखर अग्रवाल के लिए यह चुनाव पहले की अपेक्षा अधिक कठिन साबित हो सकता है।

व्यावसायिक वर्ग का समीकरण भी बदल सकता है

धनबाद कोयलांचल की पहचान के साथ-साथ व्यवसायिक गतिविधियों का केंद्र भी है। यहां के व्यापारी वर्ग का नगर निगम चुनाव में हमेशा से बड़ा योगदान रहा है। चंद्र शेखर अग्रवाल स्वयं भी व्यवसायिक वर्ग से आते हैं, और यही वर्ग अब तक उनका मुख्य समर्थन आधार रहा है।

लेकिन इस बार समीकरण कुछ अलग दिखाई दे रहे हैं। राजनीतिक गलियारों से मिल रही जानकारी के अनुसार, अगर व्यवसायिक समुदाय से कोई अन्य प्रभावशाली चेहरा मैदान में उतरता है, तो व्यवसायी वर्ग के मतों का बंटवारा तय माना जा रहा है। ऐसे में अग्रवाल के पारंपरिक वोट बैंक पर असर पड़ सकता है।

अनारक्षित सीट ने बढ़ाई प्रतिस्पर्धा

धनबाद नगर निगम की महापौर की सीट इस बार अनारक्षित (सामान्य) श्रेणी में आई है। इस बदलाव ने चुनावी तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया है। पहले जहां उम्मीदवारों की संख्या कुछ सीमित रहती थी, वहीं अब कई दिग्गज, युवा नेता और सामाजिक कार्यकर्ता भी अपनी किस्मत आजमाने की तैयारी कर रहे हैं।

अनारक्षित सीट का अर्थ है कि अब किसी एक वर्ग या समुदाय की सीमित भागीदारी नहीं रहेगी। इससे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और अधिक तीव्र होने की संभावना है। कई पूर्व पार्षद, समाजसेवी और क्षेत्रीय संगठन से जुड़े लोग भी चुनावी मैदान में उतरने की रणनीति बना रहे हैं। इस स्थिति में चंद्र शेखर अग्रवाल को अपने पुराने नेटवर्क को फिर से सक्रिय करना होगा।

पांच साल के लंबे अंतराल ने बढ़ाई चुनौती

धनबाद नगर निगम का बोर्ड का कार्यकाल जून 2020 में ही समाप्त हुआ. जिसके कारण एक लंबे अन्तराल के बाद चुनाव हो रहा है. इस दौरान स्थानीय निकायों में कई तरह के प्रशासनिक और विकासात्मक बदलाव आए हैं। जनता की अपेक्षाएं भी बदली हैं — लोग अब सिर्फ वादे नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर विकास की अपेक्षा करते हैं।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पांच साल के इस अंतराल ने चंद्र शेखर अग्रवाल जैसे वरिष्ठ नेताओं के लिए “ग्राउंड कनेक्ट” बनाए रखना कठिन कर दिया है। नगर निगम क्षेत्र के मतदाता अब नए चेहरों और युवा नेतृत्व को भी गंभीरता से देख रहे हैं। अगर अग्रवाल को दोबारा अपनी स्थिति मजबूत करनी है, तो उन्हें घर-घर संपर्क अभियान, जनसंवाद और स्थानीय मुद्दों पर सक्रियता दिखानी होगी।

भाजपा का नया चेहरा और अंदरूनी समीकरण

सूत्र बताते हैं कि भाजपा इस बार “नए चेहरे को बढ़ावा देने” की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व उन उम्मीदवारों पर दांव लगाना चाहता है जो संगठन से जुड़ाव रखते हों और जनाधार में तेजी से लोकप्रिय हो रहे हों। यह स्थिति चंद्र शेखर अग्रवाल के लिए निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकती है, क्योंकि पार्टी के भीतर उनके विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है।

हालांकि राजनीतिक विश्लेषक यह भी मानते हैं कि चंद्र शेखर अग्रवाल के पास अभी भी धनबाद नगर निगम में एक मजबूत व्यक्तिगत छवि और प्रशासनिक अनुभव है, जो उन्हें अन्य उम्मीदवारों पर बढ़त दिला सकता है — बशर्ते वे समय रहते पार्टी के भीतर और जनसंपर्क में सक्रिय भूमिका निभाएं।

जनभावना और विकास का मुद्दा रहेगा प्रमुख

धनबाद नगर निगम चुनाव में इस बार विकास, सफाई व्यवस्था, जल निकासी, ट्रैफिक जाम और सड़क मरम्मत जैसे स्थानीय मुद्दे प्रमुख रहने वाले हैं। जनता अब उन उम्मीदवारों को प्राथमिकता देना चाहती है जो इन बुनियादी समस्याओं का ठोस समाधान प्रस्तुत करें। चंद्र शेखर अग्रवाल के कार्यकाल में कुछ विकासात्मक कार्य हुए थे, लेकिन कई अधूरे प्रोजेक्ट भी चर्चा में रहे। जनता के बीच यह धारणा बनाना कि वे “फिर से बदलाव ला सकते हैं”, उनके चुनावी अभियान की सबसे बड़ी चुनौती होगी।

कुल मिलाकर देखा जाए तो धनबाद नगर निगम का यह चुनाव चंद्र शेखर अग्रवाल के लिए राजनीतिक पुनःस्थापना का अवसर भी है और चुनौती का मैदान भी। पार्टी से बढ़ी दूरी, व्यवसायिक मतों का संभावित बिखराव और नए दावेदारों की मौजूदगी उनके लिए मुश्किलें बढ़ा सकती है। हालांकि अगर वे समय रहते सक्रिय होकर जनसंपर्क अभियान तेज करते हैं और जनता के बीच फिर से अपनी पुरानी पकड़ मजबूत करते हैं, तो वे एक बार फिर महापौर पद के प्रमुख दावेदारों में शामिल हो सकते हैं।

राजनीतिक समीकरणों के बदलते इस दौर में इतना तो तय है कि धनबाद नगर निगम का चुनाव इस बार दिलचस्प और बहुकोणीय मुकाबला साबित होगा — जिसमें पुराने दिग्गजों को भी अपनी जमीन बचाने के लिए जी-तोड़ मेहनत करनी होगी।

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