धनबाद महापौर चुनाव 2026: साइलेंट कैंपेन से गेम बदलेंगे शांतनु चंद्रा?
KANHAIYA KUMAR/DHANBAD
धनबाद की सियासत में नई दस्तक: विकास और पारदर्शिता के एजेंडे पर शांतनु चंद्रा
धनबाद : झारखंड की कोयलांचल राजधानी कहे जाने वाले धनबाद में नगर निगम चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी चरम पर है। महापौर पद के लिए कुल 29 प्रत्याशी मैदान में हैं और हर उम्मीदवार अपने-अपने तरीके से मतदाताओं को साधने में जुटा है। इस बहुकोणीय मुकाबले में एक नाम लगातार चर्चा में है— शांतनु चंद्रा। युवा उद्यमी और सामाजिक सरोकारों से जुड़े चेहरे के रूप में उभरे शांतनु चंद्रा इस चुनाव में अपनी अलग रणनीति के साथ आगे बढ़ रहे हैं।
शांत प्रचार, गहरी रणनीति
जहां एक ओर कई प्रत्याशी बड़े-बड़े रोड शो, पोस्टर-बैनर और ताकत प्रदर्शन के जरिए चुनावी माहौल को गरमा रहे हैं, वहीं शांतनु चंद्रा अपेक्षाकृत “साइलेंट कैंपेन” पर जोर दे रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक वे वार्ड स्तर पर छोटी-छोटी बैठकों, समाज विशेष के संवाद कार्यक्रमों और घर-घर संपर्क अभियान के माध्यम से मतदाताओं तक पहुंच बना रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बहुकोणीय मुकाबले में “माइक्रो मैनेजमेंट” की रणनीति कई बार बड़े प्रचार अभियानों पर भारी पड़ती है। एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि “जब मैदान में 29 प्रत्याशी हों, तब 8 से 12 प्रतिशत वोट शेयर भी जीत की दिशा तय कर सकता है। ऐसे में संगठित वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभा सकता है।”
एससी/एसटी वोट बैंक पर नजर
धनबाद नगर निगम क्षेत्र में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति मतदाताओं की संख्या लगभग 1.50 लाख बताई जा रही है। स्थानीय राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार यह वर्ग नगर निगम चुनाव में अहम भूमिका निभा सकता है। यदि यह समुदाय किसी एक प्रत्याशी के पक्ष में एकजुट हो जाता है तो चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं।
सूत्रों का कहना है कि शांतनु चंद्रा ने पिछले कुछ वर्षों में दलित और पिछड़े वर्गों के मुद्दों को लेकर आवाज उठाई है। सामाजिक न्याय, शिक्षा, छात्रवृत्ति, और रोजगार से जुड़े विषयों पर उनकी सक्रियता ने उन्हें इस वर्ग में पहचान दिलाई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि एससी/एसटी मतदाता एकमुश्त समर्थन देते हैं, तो शांतनु चंद्रा मजबूत स्थिति में आ सकते हैं।
पासवान समाज का समीकरण
चुनावी गणित का एक और महत्वपूर्ण पहलू पासवान समाज का वोट है। नगर निगम क्षेत्र में लगभग 45 हजार पासवान मतदाता बताए जाते हैं। शांतनु चंद्रा इसी समाज से आते हैं, जिससे उन्हें स्वाभाविक सामाजिक आधार मिलता दिख रहा है।
हालांकि राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ जातीय पहचान जीत की गारंटी नहीं होती, लेकिन बहुकोणीय मुकाबले में जातीय एकजुटता परिणाम को प्रभावित कर सकती है। एक स्थानीय राजनीतिक विश्लेषक का कहना है, “यदि पासवान समाज बड़े पैमाने पर शांतनु चंद्रा के पक्ष में गोलबंद होता है और साथ ही एससी/एसटी के अन्य वर्गों का भी समर्थन मिलता है, तो कई स्थापित और बड़े नामों के लिए चुनौती खड़ी हो सकती है।”
बड़े चेहरों के बीच युवा दावेदारी
धनबाद की राजनीति में कई पुराने और प्रभावशाली चेहरे भी इस बार मैदान में हैं। कुछ प्रत्याशी पूर्व पदाधिकारियों या मजबूत राजनीतिक दलों के समर्थन के साथ चुनाव लड़ रहे हैं। इसके बावजूद शांतनु चंद्रा की दावेदारी इस वजह से अलग नजर आती है क्योंकि वे खुद को “विकास और पारदर्शिता” के एजेंडे पर केंद्रित बता रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार उनका फोकस तीन प्रमुख बिंदुओं पर है—
1. नगर निगम में पारदर्शी प्रशासन
2. बुनियादी सुविधाओं का सुदृढ़ीकरण
3. सामाजिक समावेशन के साथ विकास
विकास का विजन
शांतनु चंद्रा लगातार यह दावा कर रहे हैं कि यदि उन्हें जनता का समर्थन मिला तो धनबाद में विकास का एक नया अध्याय शुरू होगा। वे शहर में बेहतर सड़क, साफ-सफाई व्यवस्था, पेयजल आपूर्ति, स्ट्रीट लाइट, और डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम लागू करने की बात कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि नगर निगम चुनाव में स्थानीय मुद्दे ही निर्णायक होते हैं। “मतदाता अब सिर्फ बड़े वादों से प्रभावित नहीं होते, वे अपने मोहल्ले की सड़क, नाली, पानी और कचरा प्रबंधन को लेकर ज्यादा सजग हैं,”
बहुकोणीय मुकाबले का असर
29 प्रत्याशियों के मैदान में होने से वोटों का बिखराव तय माना जा रहा है। ऐसे में कोई भी उम्मीदवार 25-30 प्रतिशत वोट हासिल कर ले तो जीत की संभावना प्रबल हो सकती है। सूत्रों का आकलन है कि इस बार मुकाबला बेहद कड़ा और अप्रत्याशित हो सकता है।
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यदि शांतनु चंद्रा को अपने जातीय आधार के साथ-साथ युवाओं और प्रथम बार मतदान करने वाले मतदाताओं का समर्थन मिल जाता है, तो वे “डार्क हॉर्स” साबित हो सकते हैं।
चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि राह आसान नहीं है। बड़े राजनीतिक दलों के समर्थित प्रत्याशी संसाधन, संगठन और अनुभव के बल पर चुनावी मैदान में मजबूत नजर आते हैं। इसके अलावा शहरी मतदाताओं में जातीय समीकरण के साथ-साथ विकास, छवि और व्यक्तिगत विश्वसनीयता भी अहम होती है।
विश्लेषकों का मानना है कि शांतनु चंद्रा को अपने समर्थन को मतदान केंद्र तक पहुंचाने की रणनीति पर विशेष ध्यान देना होगा। चुनाव में अंतिम दिन की वोटिंग प्रतिशत और बूथ मैनेजमेंट भी निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
धनबाद नगर निगम का यह चुनाव कई मायनों में दिलचस्प होता जा रहा है। एक ओर बड़े और स्थापित चेहरे हैं, तो दूसरी ओर युवा और सामाजिक आधार पर उभरते प्रत्याशी। शांतनु चंद्रा की रणनीति फिलहाल शांत लेकिन केंद्रित दिखाई दे रही है।
यदि एससी/एसटी समुदाय और पासवान समाज का एक बड़ा वर्ग उनके पक्ष में संगठित होता है, तो चुनावी नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं। वहीं यदि वोटों का बिखराव अधिक हुआ तो मुकाबला आखिरी दौर तक रोमांचक बना रहेगा।
अब सबकी नजर मतदान दिवस और मतगणना पर टिकी है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या शांतनु चंद्रा का “साइलेंट कैंपेन” उन्हें धनबाद का अगला महापौर बनाने में सफल होता है या फिर बड़े राजनीतिक नाम बाजी मार ले जाते हैं।
