जनाधार की जंग में उलझा धनबाद: महापौर चुनाव बना प्रतिष्ठा की लड़ाई
KANHAIYA KUMAR/DHANBAD
धनबाद महापौर चुनाव: ‘हरी मिर्च’ बनाम ‘बिस्किट’ की चर्चा के बीच बदली सियासी बिसात
धनबाद नगर निगम के महापौर पद को लेकर इस बार का चुनाव दिलचस्प मोड़ पर खड़ा है। भले ही चुनाव दलगत आधार पर नहीं हो रहा हो और प्रत्याशी अपने-अपने चुनाव चिन्हों के साथ मैदान में हों, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि राजनीतिक दलों की भूमिका और समर्थन को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। शहर की राजनीतिक गलियों में इन दिनों एक चर्चा जोरों पर है—“भले ही चुनाव चिन्ह हरी मिर्च हो, पर उस पर बिस्किट भारी पड़ती नजर आ रही है।” यह टिप्पणी प्रतीकात्मक है, जो मौजूदा सियासी समीकरणों की ओर इशारा करती है।
प्रत्याशी चयन और भाजपा की रणनीति पर सवाल
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार भाजपा ने प्रत्याशी चयन में जोखिम भरा निर्णय लिया है। पार्टी की आंतरिक रायशुमारी में करीब 15 ऐसे नाम सामने आए थे, जिनकी शहर में मजबूत जमीनी पकड़ मानी जाती थी। इनमें पूर्व महापौर, पूर्व विधायक समेत कई अनुभवी चेहरे शामिल थे। यदि पार्टी इनमें से किसी पर दांव खेलती, तो चुनावी समीकरण अलग हो सकते थे।
लेकिन संजीव कुमार के नाम की घोषणा के बाद पार्टी के भीतर असंतोष की लहर देखने को मिली। कई वरिष्ठ और प्रभावशाली चेहरे अपनी अलग रणनीति के साथ मैदान में उतर गए। इसका सीधा असर भाजपा समर्थक मतदाताओं के ध्रुवीकरण पर पड़ता दिख रहा है।
दोहरी चुनौती: संगठनात्मक असंतोष और बगावत
संजीव कुमार के मैदान में आने के साथ ही पूर्व विधायक संजीव सिंह ने भी अलग राह चुनते हुए चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया। उनका तर्क साफ है कि यह चुनाव दलगत आधार पर नहीं है और हर व्यक्ति को चुनाव लड़ने की स्वतंत्रता है। हालांकि राजनीतिक जानकार इसे आंतरिक असहमति का परिणाम मान रहे हैं।
इस घटनाक्रम से भाजपा को दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है—एक ओर संगठनात्मक असंतोष, दूसरी ओर मतों का संभावित विभाजन। जब एक ही विचारधारा से जुड़े कई चेहरे अलग-अलग मैदान में हों, तो इसका असर सीधा वोट बैंक पर पड़ता है।
चंद्रशेखर अग्रवाल का समीकरण
धनबाद की राजनीति में चंद्रशेखर अग्रवाल एक मजबूत कड़ी माने जाते रहे हैं। पूर्व निकाय चुनाव में उन्होंने भाजपा के समर्थन से जीत दर्ज कर महापौर की जिम्मेदारी संभाली थी। उनके कार्यकाल को लेकर समर्थकों का दावा है कि पांच वर्षों में शहर में कई महत्वपूर्ण विकास कार्य हुए, जिनकी तुलना पिछले दो दशकों से की जाती है।
लेकिन इस बार परिस्थितियां बदली हुई हैं। राजनीतिक समीकरणों के चलते उन्होंने नया राजनीतिक दामन थाम लिया। इससे भाजपा समर्थक मतदाताओं में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हुई है। विश्लेषकों का कहना है कि यदि कोई नेता अपने कार्यकाल के प्रदर्शन के आधार पर चुनाव में उतरता है, तो उसका प्रभाव सीधे मतदाताओं के मनोविज्ञान पर पड़ता है। यही कारण है कि शहर में उनके समर्थक पुनः वापसी की उम्मीद जता रहे हैं।
‘नाम’ बनाम ‘जनाधार’ की लड़ाई
संजीव कुमार के संदर्भ में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या वे व्यक्तिगत जनाधार के अभाव में केवल संगठन के नाम पर चुनावी नैया पार कर पाएंगे? राजनीतिक विश्लेषण बताता है कि स्थानीय निकाय चुनाव में चेहरा और व्यक्तिगत संपर्क अधिक महत्वपूर्ण होता है। यहां मतदाता सीधे अपने महापौर से जुड़ाव महसूस करना चाहता है।
यदि किसी प्रत्याशी का व्यक्तिगत जनसंपर्क मजबूत नहीं है, तो उसे चुनावी मैदान में दिग्गजों से कड़ी टक्कर मिल सकती है। इस बार मुकाबले में कई ऐसे उम्मीदवार हैं, जो लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं।
इंदु सिंह की पकड़
इंदु सिंह को कोलियरी क्षेत्र में मजबूत पकड़ के लिए जाना जाता है। उनका सामाजिक जुड़ाव और क्षेत्रीय उपस्थिति उन्हें अलग पहचान देता है। विश्लेषकों का मानना है कि जिन क्षेत्रों में उनका प्रभाव है, वहां वे निर्णायक बढ़त बना सकती हैं। स्थानीय निकाय चुनाव में क्षेत्रीय समीकरण और समुदाय आधारित समर्थन अहम भूमिका निभाते हैं।
शांतनु चंद्रा की अलग राह
भाजपा से अलग राह पर चल रहे शांतनु चंद्रा भी इस चुनाव में सक्रिय हैं। वे लंबे समय से दलित-पिछड़े वर्गों के मुद्दों को उठाते रहे हैं। यही कारण है कि उनके पास अपने समुदाय का एक स्थिर वोट बैंक माना जाता है।
राजनीतिक विश्लेषण के अनुसार, यदि किसी प्रत्याशी के पास संगठित सामाजिक आधार हो, तो वह बहुकोणीय मुकाबले में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। शांतनु चंद्रा का चुनावी अभियान सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के मुद्दों पर केंद्रित बताया जा रहा है।
बहुकोणीय मुकाबले का गणित
इस बार का चुनाव सीधा मुकाबला नहीं, बल्कि बहुकोणीय संघर्ष की तस्वीर पेश कर रहा है। जब कई मजबूत चेहरे मैदान में हों, तो मतों का बंटवारा तय हो जाता है। ऐसे में जीत का अंतर कम हो सकता है और परिणाम अप्रत्याशित भी हो सकते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार चुनाव पूरी तरह व्यक्तित्व, पिछले कार्यकाल के प्रदर्शन, सामाजिक समीकरण और जमीनी नेटवर्क पर निर्भर करेगा। दलगत समर्थन की भूमिका भले ही प्रत्यक्ष न हो, लेकिन परोक्ष प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता।
मतदाताओं का मूड क्या कहता है?
शहर में अलग-अलग वर्गों से बातचीत में यह संकेत मिलता है कि मतदाता विकास, पारदर्शिता और उपलब्धता को प्राथमिकता दे रहे हैं। लोग ऐसे प्रतिनिधि की तलाश में हैं, जो शहर की मूलभूत समस्याओं—सड़क, जल निकासी, सफाई, ट्रैफिक और शहरी योजनाओं—पर ठोस काम कर सके।
कुल मिलाकर, धनबाद का महापौर चुनाव इस बार रणनीति, असंतोष, सामाजिक समीकरण और व्यक्तिगत छवि के इर्द-गिर्द घूमता नजर आ रहा है। “हरी मिर्च” और “बिस्किट” की प्रतीकात्मक चर्चा के बीच असली फैसला मतदाता ही करेंगे।
आने वाले दिनों में जनसंपर्क अभियान और चुनावी संवाद यह तय करेंगे कि किसकी रणनीति सटीक बैठती है और किसका गणित गड़बड़ाता है। फिलहाल धनबाद की सियासत पूरी तरह गर्म है और मुकाबला बेहद रोचक बन चुका है।
