विकास कार्य बनाम अधूरे सवाल: किस पर भरोसा करेगा धनबाद?
KANHAIYA KUMAR/DHANBAD
धनबाद : झारखंड की कोयलांचल राजधानी कहे जाने वाले धनबाद में नगर निगम चुनाव को लेकर सियासी तापमान चरम पर है। इस बार महापौर पद के लिए कुल 29 प्रत्याशी मैदान में हैं और मुकाबला बहुकोणीय होता दिख रहा है। शहर की राजनीति में पुराने समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं, तो नए चेहरे भी अपनी दावेदारी मजबूती से पेश कर रहे हैं। ऐसे में मतदाताओं के सामने विकल्पों की लंबी सूची है और चुनावी बहस विकास, नेतृत्व और राजनीतिक प्रतिबद्धता के इर्द-गिर्द घूम रही है।
इन्हीं प्रत्याशियों में एक प्रमुख नाम पूर्व महापौर चंद्र शेखर अग्रवाल का है। वर्ष 2015 में उन्होंने 93,136 मत प्राप्त कर जीत दर्ज की थी। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई विकास कार्यों की शुरुआत की, जिनकी चर्चा आज भी शहर की राजनीति में होती है। बेकार बाँध सरोवर के सौंदर्यीकरण और पुनर्विकास का कार्य हो, या रणधीर वर्मा स्टेडियम परिसर में मॉर्निंग वॉकर्स के लिए जॉगिंग ट्रैक और व्यायाम की सुविधा—इन पहलों को उनके समर्थक उपलब्धि के रूप में गिनाते हैं। साथ ही धनबाद से रांची को जोड़ने वाली आठ लेन सड़क परियोजना को भी उनके कार्यकाल के दौरान गति मिलने की बात कही जाती है।
उस समय राज्य और केंद्र में भाजपा की सरकार थी और चंद्र शेखर अग्रवाल भी भाजपा से जुड़े थे। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि एक ही दल की सरकार होने के कारण योजनाओं को स्वीकृति और संसाधन उपलब्ध कराने में सहूलियत मिलती है। हालांकि, इन विकास कार्यों का श्रेय किसे दिया जाए—यह अब भी बहस का विषय बना हुआ है। भाजपा इन परियोजनाओं को अपनी उपलब्धि बताती है, जबकि समर्थकों का कहना है कि स्थानीय नेतृत्व की सक्रियता भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी।
दूसरी ओर, शहर में कुछ सवाल भी लगातार उठते रहे हैं। आमजन के बीच यह चर्चा रहती है कि जब उस समय धनबाद से सांसद और विधायक भी भाजपा के ही थे, तो शहर को जाम की समस्या से निजात दिलाने के लिए बड़े फ्लाईओवर का निर्माण क्यों नहीं हो सका। खेल प्रतिभाओं के लिए एक आधुनिक और व्यवस्थित खेल मैदान की दिशा में अपेक्षित पहल क्यों नहीं हुई। इन प्रश्नों के जवाब को लेकर राजनीतिक दलों के अपने-अपने तर्क हैं, लेकिन मतदाता अब बीते कार्यों के साथ भविष्य की योजनाओं को भी तौल रहे हैं।
वर्तमान चुनाव में दिलचस्प बात यह है कि चंद्र शेखर अग्रवाल अब सत्ताधारी दल झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के समर्थित उम्मीदवार के रूप में मैदान में हैं। राजनीतिक हलकों में इसे बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। उनके समर्थकों का मानना है कि यदि उन्हें दोबारा अवसर मिलता है, तो पूर्व में शुरू हुई योजनाओं को नई गति मिल सकती है और जो कार्य अधूरे रह गए, वे पूरे किए जा सकते हैं।
उधर भाजपा ने इस बार अपने समर्थित उम्मीदवार के रूप में संजीव कुमार को मैदान में उतारा है। पार्टी के भीतर इस चयन को लेकर भी चर्चा का दौर रहा। बताया जाता है कि रायशुमारी में कई नामों पर विचार हुआ, लेकिन अंततः संजीव कुमार के नाम पर सहमति बनी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस निर्णय से पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं में असंतोष की भावना उभरी।
इसी क्रम में कई ऐसे चेहरे सामने आए जिन्होंने पार्टी लाइन से अलग होकर स्वतंत्र रूप से चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया। इनमें मुकेश पांडे का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है, जो लंबे समय से भाजपा से जुड़े रहे और छात्र राजनीति से लेकर विभिन्न आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाते रहे। इसी तरह संजीव सिंह, जिनका परिवार लंबे समय से भाजपा की राजनीति से जुड़ा रहा है, भी चर्चा में हैं। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनीतिक रूप से मजबूत मानी जाती है, फिर भी टिकट वितरण की प्रक्रिया में उनका नाम प्रमुखता से सामने नहीं आया।
इसके अलावा युवा उद्यमी और समाजसेवी शांतनु चंद्रा ने भी भाजपा छोड़कर आजसू पार्टी (आजसू) का दामन थामा। वे पूर्व में आरक्षण नीति के मुद्दे पर मुखर रहे और न्यायालय तक अपनी बात ले गए थे। इसी तरह भृगुनाथ भगत जैसे कार्यकर्ताओं की अनदेखी की चर्चा भी राजनीतिक गलियारों में होती रही। इन घटनाक्रमों ने चुनाव को और रोचक बना दिया है, क्योंकि अब मुकाबला केवल दलों के बीच नहीं, बल्कि व्यक्तित्वों और स्थानीय प्रभाव के आधार पर भी हो रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिलती है, तो टिकट चयन की रणनीति पर सवाल उठ सकते हैं। वहीं दूसरी ओर, जेएमएम समर्थित उम्मीदवार की जीत या हार को भी राज्य की व्यापक राजनीति से जोड़कर देखा जाएगा। हालांकि, यह स्पष्ट है कि नगर निगम चुनाव स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित होते हैं और मतदाता अक्सर सड़क, पानी, सफाई, ट्रैफिक और बुनियादी सुविधाओं को प्राथमिकता देते हैं।
इस बार के चुनाव में चंद्र शेखर अग्रवाल, संजीव सिंह, इंदु सिंह और शमशेर आलम जैसे नामों को मजबूत दावेदार माना जा रहा है। प्रत्येक प्रत्याशी अपने-अपने तरीके से मतदाताओं तक पहुंचने और अपनी प्राथमिकताओं को बताने में जुटा है। कोई विकास कार्यों का अनुभव गिना रहा है, तो कोई नई सोच और पारदर्शिता की बात कर रहा है। युवा मतदाताओं की भूमिका भी इस बार अहम मानी जा रही है, क्योंकि बड़ी संख्या में नए वोटर पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे।
23 फरवरी को मतदान होना है और उसी दिन यह तय होगा कि धनबाद नगर निगम की कमान किसके हाथ में जाएगी। चुनावी प्रचार अपने अंतिम चरण में है, लेकिन अंतिम फैसला मतदाताओं के हाथ में है। शहर की जनता विकास, अनुभव और भविष्य की संभावनाओं के बीच संतुलन साधते हुए अपने प्रतिनिधि का चयन करेगी।
फिलहाल पूरे शहर की निगाहें मतदान दिवस पर टिकी हैं। राजनीतिक समीकरण, दल-बदल, असंतोष और समर्थन—इन सभी के बीच लोकतंत्र का यह उत्सव धनबाद की दिशा और दशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। अब देखना दिलचस्प होगा कि मतदाता किस पर भरोसा जताते हैं और आने वाले वर्षों में शहर की विकास यात्रा किस राह पर आगे बढ़ती है।
