‘अपनों ने लूटा’ वाली चर्चा के बीच धनबाद में बड़ा उलटफेर, संजीव सिंह की दमदार जीत से संगठन पर उठे सवाल
KANHAIYA KUMAR/DHANBAD
धनबाद नगर निगम चुनाव के नतीजों ने इस बार सियासी हलकों में बड़ी हलचल मचा दी है। मशहूर पंक्ति — “हमें तो अपनों ने लूटा, गैरों में कहाँ दम था, मेरी कश्ती वहीं डूबी जहाँ पानी कम था” — इन दिनों धनबाद की राजनीति में चर्चा का विषय बनी हुई है। वजह साफ है। भाजपा समर्थित प्रत्याशी संजीव कुमार की चौथे स्थान पर हुई हार ने पार्टी की अंदरूनी रणनीति और प्रत्याशी चयन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
धनबाद, जिसे लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है, वहां इस बार समीकरण पूरी तरह बदलते नजर आए। शहर और आसपास के क्षेत्र से भाजपा के तीन विधायक और एक सांसद होने के बावजूद पार्टी समर्थित उम्मीदवार को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया। नतीजा यह हुआ कि भाजपा समर्थित संजीव कुमार को 57,895 मतों पर संतोष करना पड़ा और वे चौथे स्थान पर खिसक गए।
वहीं दूसरी ओर, भाजपा से अलग होकर निर्दलीय मैदान में उतरे संजीव सिंह ने 1,14,362 मत हासिल कर सभी को चौंका दिया। उन्होंने भाजपा समर्थित प्रत्याशी को 56,467 मतों के भारी अंतर से पीछे छोड़ते हुए जीत दर्ज की। यह जीत सिर्फ एक चुनावी सफलता नहीं, बल्कि संगठन और रणनीति के खिलाफ एक संदेश के तौर पर भी देखी जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संजीव सिंह की जीत ने यह साबित कर दिया कि व्यक्तिगत जनाधार और जमीनी पकड़ कई बार पार्टी के सिंबल से ज्यादा प्रभावी साबित होती है। उन्होंने “एकला चलो” की राह अपनाई और उसी राह पर चलते हुए जनता का भरोसा जीत लिया। खासकर कतरास क्षेत्र, जिसे सांसद का गढ़ कहा जाता है, वहां से भी उन्हें अच्छा समर्थन मिला। यह तथ्य भाजपा के लिए आत्ममंथन का विषय बन गया है।
दूसरे स्थान पर रहे चंद्र शेखर अग्रवाल, जो पहले भाजपा में थे और बाद में झामुमो में शामिल हुए, उन्होंने 82,462 मत प्राप्त किए। उनकी स्थिति भी मजबूत रही और उन्होंने दिखाया कि पार्टी बदलने के बावजूद उनका व्यक्तिगत प्रभाव बना हुआ है। हालांकि वे जीत तक नहीं पहुंच सके, लेकिन दूसरे स्थान पर रहकर उन्होंने स्पष्ट संकेत दे दिया कि शहर की राजनीति में उनकी पकड़ अभी भी कायम है।
इस चुनाव का सबसे बड़ा सवाल प्रत्याशी चयन को लेकर उठ रहा है। भाजपा जिन नेताओं से स्पष्टीकरण मांग रही थी या जिनके खिलाफ अनुशासनात्मक रुख अपना रही थी, उन्हीं में से एक नेता ने जीत दर्ज कर यह संकेत दिया कि जमीनी कार्यकर्ताओं और समर्थकों की भावनाओं को नजरअंदाज करना पार्टी के लिए भारी पड़ सकता है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा जोरों पर है कि अगर टिकट वितरण में अधिक सावधानी बरती जाती, तो परिणाम कुछ और हो सकते थे।
भाजपा समर्थित प्रत्याशी के प्रचार में कई बड़े चेहरे मैदान में उतरे। रोड शो, सभाएं और प्रचार अभियान जोरदार रहे। लेकिन मतदाताओं ने शायद इस बार चेहरे से ज्यादा स्थानीय समीकरण और व्यक्तिगत संपर्क को महत्व दिया। यही वजह रही कि प्रचार की चमक-दमक के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सके।
कोयलांचल क्षेत्र में यह भी दावा किया जा रहा था कि संजीव सिंह के मतों में बिखराव होगा और इसका लाभ अन्य प्रत्याशियों को मिलेगा। लेकिन नतीजों ने इस आकलन को गलत साबित कर दिया। मतों का बिखराव नहीं हुआ, बल्कि स्पष्ट रूप से एकतरफा समर्थन दिखाई दिया।
इंदु सिंह को मात्र 16,301 मत मिले, जिससे यह साफ हो गया कि मतदाताओं ने उन्हें पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया। दिलचस्प बात यह रही कि पहली बार चुनाव मैदान में उतरे प्रकाश कुमार को 21,727 मत प्राप्त हुए और वे पांचवें स्थान पर रहे। यह आंकड़ा बताता है कि नई छवि और नए विकल्प को भी मतदाताओं ने गंभीरता से लिया।
धनबाद की राजनीति में इस बार जातीय, क्षेत्रीय और संगठनात्मक समीकरणों से ज्यादा प्रभाव व्यक्तिगत जनाधार और स्थानीय मुद्दों का दिखा। शहर के विकास, सफाई व्यवस्था, पेयजल, सड़क और कोयलांचल क्षेत्र की समस्याएं चुनावी चर्चा के केंद्र में रहीं। मतदाताओं ने भावनात्मक अपील से ज्यादा काम और संपर्क को प्राथमिकता दी।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, यह परिणाम भाजपा के लिए एक चेतावनी है। लंबे समय से मजबूत गढ़ माने जाने वाले क्षेत्र में इस तरह का परिणाम यह दर्शाता है कि संगठन के भीतर समन्वय और कार्यकर्ताओं की नाराजगी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि समय रहते आत्ममंथन नहीं किया गया, तो भविष्य में भी ऐसे परिणाम सामने आ सकते हैं।
वहीं संजीव सिंह की जीत ने उन्हें शहर की राजनीति में एक मजबूत स्तंभ के रूप में स्थापित कर दिया है। निर्दलीय होकर इतनी बड़ी जीत दर्ज करना आसान नहीं होता। यह दर्शाता है कि उनके पास एक स्थायी और समर्पित मतदाता आधार है। आने वाले समय में उनका राजनीतिक भविष्य और भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
चंद्र शेखर अग्रवाल का दूसरे स्थान पर रहना भी संकेत देता है कि मुकाबला त्रिकोणीय था और मतदाताओं ने तीन प्रमुख चेहरों के बीच स्पष्ट विभाजन किया। लेकिन अंततः जीत उसी के खाते में गई, जिसने जमीनी स्तर पर मजबूत पकड़ बनाई।
धनबाद नगर निगम चुनाव 2026 का यह परिणाम आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के लिए भी संकेत दे गया है। भाजपा को अपने गढ़ में ही चुनौती का सामना करना पड़ा है। यह चुनाव सिर्फ मेयर की कुर्सी का नहीं, बल्कि संगठनात्मक मजबूती और नेतृत्व क्षमता की परीक्षा भी बन गया।
फिलहाल शहर में चर्चा का बाजार गर्म है। भाजपा समर्थक आत्ममंथन में जुटे हैं, जबकि संजीव सिंह के समर्थकों में उत्साह का माहौल है। एक बात तो तय है कि इस चुनाव ने धनबाद की राजनीति को नया मोड़ दे दिया है और आने वाले दिनों में इसके दूरगामी असर देखने को मिल सकते हैं।
