धनबाद में महापौर की कुर्सी पर सियासी संग्राम रिकॉर्ड प्रत्याशी, बदले समीकरण और चार ध्रुवों में बंटा मुकाबला
POOJA RAI/DHANBAD
धनबाद:- झारखंड नगर निकाय चुनाव के तहत बुधवार को नामांकन प्रक्रिया पूरी होते ही धनबाद नगर निगम क्षेत्र की राजनीति पूरी तरह गर्मा चुकी है। नामांकन के साथ ही चुनावी तस्वीर लगभग साफ हो गई है और अब मुकाबला सीधा मतदाताओं के बीच उतर चुका है। इस बार महापौर पद के लिए रिकॉर्ड संख्या में प्रत्याशी मैदान में हैं। कुल 29 प्रत्याशियों को चुनाव चिह्न (सिंबल) आवंटित कर दिए गए हैं, जिसके बाद चुनाव प्रचार ने रफ्तार पकड़ ली है।
इस बार का महापौर चुनाव किसी एक दल या एक चेहरे के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ नहीं है। बल्कि यह चुनाव बहुकोणीय, जटिल और बेहद रोमांचक होता नजर आ रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो धनबाद का यह चुनाव कम से कम चार बड़े राजनीतिक ध्रुवों के बीच सिमटा हुआ दिख रहा है, जहां हर ध्रुव की अपनी ताकत, अपना वोट बैंक और अपनी सीमाएं हैं। यही वजह है कि अभी किसी एक प्रत्याशी को स्पष्ट बढ़त में मानना जल्दबाजी होगी।
रिकॉर्ड प्रत्याशी, बढ़ी प्रतिस्पर्धा
धनबाद नगर निगम का महापौर पद हमेशा से राजनीतिक रूप से अहम रहा है, लेकिन इस बार दिलचस्पी का स्तर अभूतपूर्व है। जहां 2015 में 23 प्रत्याशी मैदान में थे, वहीं इस बार 29 प्रत्याशी किस्मत आजमा रहे हैं। इतनी बड़ी संख्या में प्रत्याशियों का होना साफ संकेत देता है कि चुनाव में वोटों का बिखराव तय है।
खास बात यह है कि इस बार NOTA का विकल्प समाप्त कर दिया गया है, जिससे वे मतदाता जो पहले नोटा का प्रयोग करते थे, अब किसी न किसी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करने को मजबूर होंगे। इसका सीधा असर चुनावी गणित पर पड़ेगा और कम अंतर से जीत-हार की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।
चार प्रमुख ध्रुवों में बंटा मुकाबला
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, धनबाद का महापौर चुनाव मुख्य रूप से चार बड़े ध्रुवों के इर्द-गिर्द घूम रहा है—
1. मजदूर और कोयलांचल प्रभाव वाला ध्रुव
2. भाजपा और संगठन आधारित ध्रुव
3. पुराने राजनीतिक चेहरे और पारंपरिक समर्थन
4. निर्दलीय व छोटे प्रत्याशी, जो समीकरण बिगाड़ने की क्षमता रखते हैं
इन सभी ध्रुवों के बीच वोटों का विभाजन ही इस बार के चुनाव का सबसे बड़ा फैक्टर साबित होने वाला है।
संजीव सिंह: मजदूर वोट बैंक और मजबूत जनाधार
इस चुनाव में जिन चेहरों पर सबसे ज्यादा चर्चा है, उनमें पूर्व विधायक संजीव सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। वे झरिया की वर्तमान विधायक रागनी सिंह के पति हैं और झरिया, कोयलांचल व आसपास के इलाकों में उनका प्रभाव लंबे समय से माना जाता रहा है।
संजीव सिंह की सबसे बड़ी ताकत उनका मजबूत जनाधार और मजदूर वर्ग से सीधा जुड़ाव है। धनबाद जैसे औद्योगिक क्षेत्र में जहां कोयला खदानें, मजदूर यूनियन और श्रमिक संगठन निर्णायक भूमिका निभाते हैं, वहां मजदूर वोट बैंक किसी भी प्रत्याशी को जीत की दहलीज तक पहुंचा सकता है।
युवाओं के बीच उनकी अच्छी पकड़ बताई जाती है। साथ ही उनकी सरल, मृदुभाषी और सुलभ छवि उन्हें आम मतदाताओं के बीच स्वीकार्य बनाती है। राजनीतिक सूत्रों की मानें तो कई मजदूर संगठनों का झुकाव उनके पक्ष में माना जा रहा है, जो उन्हें एक मजबूत दावेदार बनाता है।
भाजपा के संजीव कुमार: संगठन और सत्ता का भरोसा
दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी ने समाजसेवी सह उद्यमी संजीव कुमार को अपना आधिकारिक प्रत्याशी बनाया है। भाजपा के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा का सवाल बना हुआ है, क्योंकि धनबाद नगर निगम क्षेत्र में पार्टी की राजनीतिक पकड़ काफी मजबूत रही है।
वर्तमान में धनबाद नगर निगम क्षेत्र से भाजपा के तीन विधायक और एक सांसद आते हैं। यदि संगठन पूरी तरह एकजुट होकर चुनाव प्रचार में उतरता है और सभी जनप्रतिनिधि खुलकर मैदान में सक्रिय रहते हैं, तो भाजपा प्रत्याशी के लिए जीत की राह काफी आसान हो सकती है।
संजीव कुमार की छवि एक सफल उद्यमी और समाजसेवी की रही है। इसका सीधा फायदा उन्हें शहरी मध्यम वर्ग, व्यापारी समुदाय और शिक्षित मतदाताओं से मिलने की संभावना है। इसके साथ ही वे RSS के पुराने कैडर माने जाते हैं, जिससे संघ से जुड़े संगठनों और कार्यकर्ताओं का सहयोग भी उन्हें मिलने की पूरी संभावना है।
हालांकि, बहुकोणीय मुकाबले में सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि भाजपा का कोर वोट बैंक कितना संगठित होकर मतदान करता है और क्या अंदरूनी असंतोष पूरी तरह नियंत्रित रह पाता है या नहीं।
2015 के चुनाव से बदले हालात
यदि 2015 के नगर निकाय चुनाव पर नजर डालें, तो उस समय महापौर पद आरक्षित था और चुनावी परिस्थितियां बिल्कुल अलग थीं। उस चुनाव में कुल 23 प्रत्याशी मैदान में थे और NOTA को 7,755 वोट मिले थे, जो अपने आप में एक बड़ा आंकड़ा था।
2015 में चंद्र शेखर अग्रवाल ने 93,136 मत प्राप्त कर जीत दर्ज की थी। उस समय उन्हें झरिया क्षेत्र के दोनों प्रमुख घरानों का समर्थन मिला था, साथ ही व्यवसायी वर्ग और भाजपा संगठन का भी खुला सहयोग प्राप्त था।
लेकिन इस बार राजनीतिक हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। चंद्र शेखर अग्रवाल ने भाजपा का दामन छोड़ दिया है, जिससे उनके लिए परिस्थितियां पहले जैसी अनुकूल नहीं मानी जा रही हैं। पुराने गठजोड़ टूट चुके हैं और नए समीकरण अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं।
इंदु देवी: अनुभव और पहचान की ताकत
धनबाद की प्रथम महापौर इंदु देवी भी इस बार चुनावी चर्चा में बनी हुई हैं। उनके पास प्रशासनिक अनुभव, पुरानी पहचान और राजनीतिक समझ है, जो उन्हें अन्य प्रत्याशियों से अलग खड़ा करती है।
सूत्रों के अनुसार, उन्हें रघुकुल का समर्थन मिलने की संभावना है। साथ ही कुछ मजदूर यूनियनों का झुकाव भी उनके पक्ष में बताया जा रहा है। यदि ये समर्थन जमीनी स्तर पर एकजुट होकर सामने आते हैं, तो इंदु देवी चुनावी मुकाबले में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं।
शमशेर आलम और अन्य प्रत्याशी
2015 के चुनाव में 50,611 वोट प्राप्त कर दूसरे स्थान पर रहे शमशेर आलम के लिए इस बार की राह पहले से कहीं ज्यादा कठिन नजर आ रही है। बदले राजनीतिक समीकरण, नए प्रत्याशियों की मौजूदगी और वोटों का बिखराव उनकी मुश्किलें बढ़ा सकता है।
इसके अलावा मैदान में मौजूद कई निर्दलीय और कम चर्चित प्रत्याशी भी ऐसे हैं, जो भले ही जीत की दौड़ में न हों, लेकिन वोट काटने की भूमिका जरूर निभा सकते हैं। यही प्रत्याशी चुनावी परिणाम को अप्रत्याशित बना सकते हैं।
रोमांचक और निर्णायक चुनाव
कुल मिलाकर, धनबाद नगर निगम का यह महापौर चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक और खास माना जा रहा है। रिकॉर्ड प्रत्याशी, नोटा का हटना, बदले राजनीतिक गठजोड़ और बहुकोणीय मुकाबला—इन सभी कारणों से चुनाव बेहद दिलचस्प मोड़ पर खड़ा है।
अब सबकी निगाहें चुनाव प्रचार, अंतिम दौर की रणनीतियों, संभावित गठबंधनों और सबसे अहम—मतदाताओं के फैसले पर टिकी हैं। आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि धनबाद की सत्ता की चाबी किसके हाथ में जाती है और शहर की विकास दिशा कौन तय करेगा।
