एआई के दौर में एनिमेशन का भविष्य उज्ज्वल, तकनीक को अपना ‘कर्मचारी’ बनाएं: आशीष कुलकर्णी
संजय चौरसिया /धनबाद
धनबाद : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के तेजी से बढ़ते प्रभाव के बीच एनिमेशन और विजुअल इफेक्ट्स इंडस्ट्री के भविष्य को लेकर देश-दुनिया में व्यापक चर्चा हो रही है। एआई जहां कंटेंट निर्माण को पहले की तुलना में तेज और आसान बना रहा है, वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि रचनात्मकता, कहानी कहने की क्षमता और तकनीकी बुनियादी कौशल का महत्व आने वाले समय में भी कम नहीं होगा। एआई को मानव का विकल्प बनाने के बजाय प्रोडक्शन प्रक्रिया का प्रभावी हिस्सा बनाना ही इस क्षेत्र की सबसे बड़ी जरूरत है।
इसी विषय पर बॉलीवुड एनिमेशन इंडस्ट्री के दिग्गजों में शामिल आशीष कुलकर्णी, संस्थापक एवं निदेशक—इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव टेक्नोलॉजीज तथा संस्थापक—पुन्नर्युग आर्टविज़न प्राइवेट लिमिटेड, ने विस्तार से अपने विचार साझा किए। देश में वर्ल्ड क्लास एनिमेशन स्टूडियो स्थापित करने वाले कुलकर्णी ने एआई के बढ़ते प्रभाव, एनिमेशन इंडस्ट्री के भविष्य, युवाओं के लिए रोजगार की संभावनाओं और सरकार की नीतियों पर विस्तार से चर्चा की।
एआई को हावी नहीं, प्रोडक्शन का हिस्सा बनाना जरूरी
आशीष कुलकर्णी ने कहा कि एआई के विकास के साथ चुनौतियों के साथ-साथ बड़ी संभावनाएं भी सामने आई हैं। इसकी मदद से कम समय में बेहतर गुणवत्ता का कंटेंट तैयार किया जा सकता है। हालांकि, एआई को पूरी तरह अपने ऊपर हावी होने देने के बजाय इसे प्रोडक्शन प्रोसेस में एकीकृत करने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि एआई को एक ‘कर्मचारी’ की तरह इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यानी इंसान को दिशा तय करनी चाहिए और एआई को काम आसान बनाने वाले टूल के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए। रचनात्मक निर्णय, कहानी की समझ और अंतिम गुणवत्ता का नियंत्रण मानव के हाथ में रहना बेहद जरूरी है।
बुनियादी कौशल का कोई विकल्प नहीं
एनिमेशन और फिल्म मेकिंग के अकादमिक पाठ्यक्रम में एआई को शामिल किए जाने के सवाल पर कुलकर्णी ने कहा कि विद्यार्थियों के लिए सबसे पहले बुनियादी कौशल मजबूत करना जरूरी है। स्टोरी टेलिंग, फिल्म मेकिंग का व्याकरण, विजुअल लैंग्वेज और क्रिएटिव सोच इस क्षेत्र की नींव हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि एआई को मुख्य पाठ्यक्रम के बजाय एक एप्लीकेशन या टूल के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति की बुनियादी समझ कमजोर है और एआई कोई गलती करता है, तो वह व्यक्ति उस गलती को पहचानने में सक्षम नहीं होगा और संभव है कि उसी गलत जानकारी को आगे बढ़ा दे।
कुलकर्णी के अनुसार, एआई के दौर में इंसान की सबसे बड़ी ताकत उसकी समझ और निर्णय लेने की क्षमता होगी। सही और गलत कंटेंट के बीच अंतर करने के लिए मजबूत फाउंडेशन स्किल्स आवश्यक हैं।
एआई के खिलाफ नहीं, लेकिन नियंत्रण इंसान के हाथ में हो
तकनीकी बदलाव को लेकर उन्होंने कहा कि नई तकनीक का विरोध करने से विकास की गति को नहीं रोका जा सकता। उन्होंने कहा कि दुनिया तेजी से बदल रही है और भारत को इस बदलाव के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना होगा।
उन्होंने कहा, “हम एआई के खिलाफ नहीं हैं। हर नई तकनीक अपने साथ एक नया स्वरूप लेकर आती है। हम इससे मुंह नहीं मोड़ सकते, वरना दुनिया से पीछे छूट जाएंगे। लेकिन तकनीक को खुद पर हावी होने देना भी सही नहीं है।”
एनिमेशन कंटेंट दशकों तक रहता है प्रासंगिक
कुलकर्णी ने एनिमेशन की खासियत बताते हुए कहा कि इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी लंबी उम्र है। उन्होंने ‘टॉम एंड जेरी’ और अपने द्वारा निर्मित लोकप्रिय एनिमेशन ‘लिटिल कृष्णा’ का उदाहरण देते हुए कहा कि अच्छे एनिमेशन की प्रासंगिकता कई दशकों तक बनी रहती है।
उन्होंने कहा कि एनिमेशन को केवल बच्चों तक सीमित करके देखना सही नहीं है। यह हर आयु वर्ग के दर्शकों के लिए प्रभावी माध्यम है। एक अच्छी कहानी और मजबूत विजुअल ट्रीटमेंट वाला एनिमेशन कंटेंट आने वाले 50 से 100 वर्षों तक भी लोगों के बीच अपनी जगह बनाए रख सकता है।
विजुअल इफेक्ट्स के बिना आधुनिक सिनेमा अधूरा
फिल्म इंडस्ट्री में एनिमेशन और विजुअल इफेक्ट्स की बढ़ती भूमिका पर उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में शायद ही कोई बड़ा प्रोडक्शन ऐसा हो जिसमें विजुअल इफेक्ट्स की जरूरत न पड़ती हो। फीचर फिल्म, डॉक्यूमेंट्री, वेब कंटेंट या विज्ञापन—हर क्षेत्र में वीएफएक्स और डिजिटल क्रिएटिव तकनीक का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है।
उन्होंने कहा कि दर्शकों की अपेक्षाएं बढ़ने के साथ फिल्म निर्माताओं के सामने भी बेहतर और विश्वसनीय विजुअल प्रस्तुत करने की चुनौती है। ऐसे में एनिमेशन, वीएफएक्स और नई डिजिटल तकनीक मनोरंजन उद्योग का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं।
‘क्रिएटिव इंडिया मिशन’ से युवाओं को मिलेंगे नए अवसर
एनिमेशन, गेमिंग और क्रिएटिव इंडस्ट्री को बढ़ावा देने के सरकारी प्रयासों का जिक्र करते हुए कुलकर्णी ने बताया कि भारत सरकार की ओर से ‘क्रिएटिव इंडिया मिशन’ जैसे प्रयास किए जा रहे हैं। इन पहलों का उद्देश्य देश में क्रिएटिव इकोसिस्टम को मजबूत करना और युवाओं को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए तैयार करना है।
उन्होंने बताया कि अब तक 11 राज्यों में एनिमेशन और गेमिंग पॉलिसी तैयार की जा चुकी है। आने वाले समय में सात और राज्यों को इसमें शामिल किए जाने की योजना है। इस तरह वर्ष के अंत तक करीब 18 राज्यों में एनिमेशन और गेमिंग से जुड़ी नीतियां लागू होने की उम्मीद है।
युवाओं के लिए रोजगार और करियर की बड़ी संभावनाएं
आशीष कुलकर्णी ने कहा कि एनिमेशन, गेमिंग, वीएफएक्स और अन्य क्रिएटिव क्षेत्रों में युवाओं के लिए आने वाले समय में रोजगार के नए रास्ते खुलेंगे। राष्ट्रीय स्तर की नीतियों के साथ-साथ राज्य सरकारों की ओर से तैयार की जा रही स्थानीय नीतियां इस उद्योग को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
उन्होंने कहा कि भारत में बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली युवा हैं, जिन्हें बेहतर प्रशिक्षण, आधुनिक तकनीक और सही अवसर मिलने की जरूरत है। यदि युवाओं को मजबूत बुनियादी कौशल के साथ एआई और नई तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जाए, तो भारत वैश्विक क्रिएटिव इंडस्ट्री में बड़ी भूमिका निभा सकता है।

कुलकर्णी के विचारों का सार यही है कि एआई को रोजगार छीनने वाली तकनीक के रूप में देखने के बजाय उसे रचनात्मक क्षमता बढ़ाने वाले साधन के रूप में समझना चाहिए। आने वाले समय में वही क्रिएटर आगे बढ़ेंगे जो अपनी मूल रचनात्मक और तकनीकी क्षमताओं को मजबूत रखते हुए एआई जैसे आधुनिक टूल्स का प्रभावी इस्तेमाल करना जानते होंगे।
एनिमेशन और वीएफएक्स इंडस्ट्री में भारत की बढ़ती संभावनाओं के बीच विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार की नीतियों, निजी निवेश, आधुनिक प्रशिक्षण संस्थानों और युवाओं की प्रतिभा का बेहतर तालमेल देश को वैश्विक क्रिएटिव हब बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
