धनबाद निकाय चुनाव: अचानक जनता-प्रेमी बने महापौर प्रत्याशी, वार्ड दर वार्ड ‘आशीर्वाद यात्रा’ जारी
KANHAIYA KUMAR/DHANBAD
धनबाद:-धनबाद नगर निगम चुनाव ने इस बार राजनीति को ऐसा रंग दिखाया है कि आम जनता भी चौंक रही है और मुस्कुरा भी रही है। महापौर पद के लिए मैदान में उतरे 29 प्रत्याशी इन दिनों कुछ ऐसे व्यवहार कर रहे हैं, मानो वर्षों से जनता के बीच ही रहे हों—हालांकि हकीकत यह है कि इनमें से कई चेहरे ऐसे हैं, जिनका जनता से सीधा संवाद चुनाव से पहले तक लगभग शून्य था।
लेकिन चुनाव क्या आया, हालात बदल गए। जो चेहरे कभी सड़क, नाली, पानी और बिजली से दूरी बनाए रखते थे, वही अब गली-गली, मुहल्ला-मुहल्ला घूमते नजर आ रहे हैं। हाथ जोड़ने की कला, मुस्कुराने का अभ्यास और “मैं हमेशा आपके साथ हूं” जैसे संवादों में अचानक महारत हासिल हो गई है।
वादों की बौछार, हकीकत से दूर उड़ान
धनबाद की सड़कों पर इन दिनों वादों की ऐसी बारिश हो रही है कि लगता है शहर अगले पांच साल में सिंगापुर से सीधा न्यूयॉर्क बन जाएगा। कोई कह रहा है—हर घर में रोजगार, तो कोई दावा कर रहा है—हर वार्ड में विकास की गंगा बहेगी।
हालांकि जनता यह सोचकर असमंजस में है कि जिन लोगों ने आज तक मोहल्ले की टूटी सड़क नहीं देखी, वे पूरे शहर का नक्शा कैसे बदल देंगे।
पूर्व पार्षद बने ‘ब्रह्मास्त्र’
इस चुनाव की सबसे दिलचस्प रणनीति है—पूर्व पार्षदों से विशेष लगाव। प्रत्याशियों को अब यह अच्छी तरह समझ आ गया है कि धनबाद की राजनीति में पूर्व पार्षद केवल पूर्व नहीं होते, बल्कि वे अपने-अपने वार्डों में आज भी वोट बैंक के संचालक होते हैं।
यही वजह है कि कई महापौर प्रत्याशी पहले जनता से कम और पूर्व पार्षदों से ज्यादा संपर्क करते नजर आ रहे हैं। चाय, नाश्ता, सम्मान और “आपके अनुभव की हमें जरूरत है” जैसे जुमले धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहे हैं।
तर्क साफ है—अगर पार्षद का आशीर्वाद मिल गया, तो वार्ड का रास्ता अपने आप साफ।
55 वार्ड, 55 परीक्षा केंद्र
धनबाद नगर निगम क्षेत्र में कुल 55 वार्ड हैं और असल चुनाव इन्हीं वार्डों में लड़ा जाना है। सियासी जानकारों की मानें तो महापौर वही बनेगा, जिसकी पकड़ इन वार्डों में मजबूत होगी।
बड़े भाषण, पोस्टर-बैनर और सोशल मीडिया प्रचार से ज्यादा जरूरी है—वार्ड स्तर पर पकड़। यही बात प्रत्याशियों को भी समझ आ चुकी है, इसलिए अब हेलीकॉप्टर विजन छोड़कर गली-मोहल्ला विजन अपनाया जा रहा है।
जनता भी अब समझदार
हालांकि धनबाद की जनता भी अब काफ़ी समझदार हो चुकी है। वह यह पहचानने लगी है कि कौन चुनावी मौसम का नेता है और कौन सालभर दिखाई देता रहा है।
लोग अब वादों से ज्यादा यह देख रहे हैं कि “आप पहले कहां थे?” और “अब अचानक कैसे आ गए?”
कुल मिलाकर, धनबाद का यह निकाय चुनाव राजनीतिक व्यंग्य का जीवंत उदाहरण बन चुका है। अचानक जनता-प्रेम, अचानक संवाद और अचानक विकास की चिंता—सब कुछ चुनावी मौसम का असर है।
अब देखना यह है कि जनता इन बड़े-बड़े वादों से प्रभावित होती है या फिर वार्डों में वर्षों से जमी पकड़ ही आखिरकार महापौर की कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता तय करेगी।
फिलहाल धनबाद की गलियों में यही चर्चा है—
“नेता तो बहुत हैं, पर याद वही रहेगा जो चुनाव के बाद भी दिखे।”
