निकाय चुनाव में सियासी संग्राम, दिग्गजों से लेकर बागियों तक—महापौर की कुर्सी के लिए दिलचस्प मुकाबला तय
POOJA RAI/DHANBAD
DHANBAD:-धनबाद नगर निकाय चुनाव इस बार कई मायनों में बेहद दिलचस्प और रोमांचक होने जा रहा है। खासकर महापौर पद को लेकर राजनीतिक हलचल अपने चरम पर है। वर्ष 2015 के नगर निकाय चुनाव की तुलना में इस बार महापौर पद के लिए कहीं अधिक प्रत्याशी मैदान में उतरते नजर आ रहे हैं। भले ही यह चुनाव दलीय आधार पर नहीं हो रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल अपने-अपने समर्थित और पार्टी समर्पित प्रत्याशियों को मैदान में उतारने की तैयारी में जुटे हुए हैं।
दलीय चुनाव नहीं, लेकिन दलों की पूरी ताकत
कागजों में यह चुनाव भले ही गैर-दलीय हो, पर सियासी गलियारों में इसे पूरी तरह दलीय चुनाव के तौर पर ही देखा जा रहा है। भाजपा, कांग्रेस और झामुमो (JMM) जैसे प्रमुख दलों ने अंदरखाने रणनीति बनानी शुरू कर दी है। प्रत्याशियों के चयन को लेकर मंथन, रायशुमारी और गुप्त बैठकों का दौर लगातार जारी है। हर पार्टी इस कोशिश में है कि ऐसा चेहरा सामने लाया जाए जो न सिर्फ संगठन के प्रति वफादार हो, बल्कि जातीय, सामाजिक और स्थानीय समीकरणों में भी फिट बैठे।
बागी तेवर और “पार्टी से ऊपर” की राजनीति
इस चुनाव की सबसे दिलचस्प बात यह है कि कई ऐसे प्रत्याशी भी सामने आ चुके हैं जिन्होंने पार्टी के औपचारिक ऐलान का इंतजार तक नहीं किया। ऐसे उम्मीदवार सीधे मैदान में कूद पड़े हैं, मानो उन्हें पार्टी के दिशा-निर्देशों की आवश्यकता ही न हो। आम लोगों के बीच अब यह चर्चा भी तेज है कि कुछ नेता खुद को पार्टी से ऊपर समझने लगे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि क्या पार्टी ऐसे बागी प्रत्याशियों को समर्थन देगी या फिर संगठनात्मक अनुशासन के तहत उनके खिलाफ रुख अपनाएगी। यह फैसला आने वाले दिनों में चुनाव की दिशा और दशा तय करेगा।
भाजपा और कांग्रेस में मंथन चरम पर
भाजपा और कांग्रेस—दोनों ही दल फिलहाल रायशुमारी की प्रक्रिया में हैं। संगठन के भीतर कई नामों पर चर्चा चल रही है। सूत्रों की मानें तो अगले एक से दो दिनों में दोनों पार्टियां अपने-अपने पार्टी समर्थित प्रत्याशी की घोषणा कर सकती हैं।
भाजपा की बात करें तो कई नामों का पैनल प्रदेश नेतृत्व को भेजा जा चुका है। संगठन के अंदर इस बात को लेकर गहन मंथन है कि किस चेहरे पर दांव लगाया जाए, जिससे शहरी मतदाताओं, व्यापारिक वर्ग और पारंपरिक वोट बैंक—तीनों को साधा जा सके। संभावना जताई जा रही है कि शुक्रवार तक भाजपा अपना पत्ता खोल सकती है।
वहीं कांग्रेस में भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। हालांकि सूत्र यह संकेत दे रहे हैं कि पार्टी एक बार फिर शमशेर आलम को मैदान में उतार सकती है। शमशेर आलम पूर्व में भी मजबूत प्रदर्शन कर चुके हैं और कांग्रेस का एक वर्ग उन्हें फिर से मौका देने के पक्ष में है। हालांकि अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व के हाथ में है।
JMM ने चला शुरुआती दांव
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने अन्य दलों की तुलना में पहले ही अपना दांव चल दिया है। पार्टी ने नीलम मिश्रा को महापौर प्रत्याशी घोषित कर मैदान में उतार दिया है। इसे JMM की रणनीतिक बढ़त के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी का मानना है कि जल्दी उम्मीदवार घोषित करने से जमीनी स्तर पर प्रचार और जनसंपर्क को मजबूत किया जा सकता है। महिला प्रत्याशी के रूप में नीलम मिश्रा को उतारकर JMM महिला वोटरों और पार्टी के कोर समर्थकों को साधने की कोशिश में है।
पुराने चेहरे, नए दावेदार
इस चुनाव में पुराने और नए चेहरों का दिलचस्प संगम देखने को मिल रहा है। पूर्व महापौर चंद्र शेखर अग्रवाल गुरुवार को अपना नामांकन दाखिल करने जा रहे हैं। उनके नामांकन को लेकर पहले से ही राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज है। पूर्व महापौर होने के नाते उनके पास अनुभव है, जिसे वे अपनी सबसे बड़ी ताकत के रूप में पेश कर सकते हैं।
दूसरी ओर, उद्यमी ई. रवि चौधरी भी महापौर पद के लिए मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं। जानकारी के अनुसार वे शनिवार या सोमवार को अपना नामांकन पत्र दाखिल कर सकते हैं। एक सफल उद्यमी के रूप में उनकी छवि और विकास आधारित एजेंडा शहरी मतदाताओं को आकर्षित कर सकता है।
मतदाताओं की भूमिका और बदलता मिजाज
धनबाद नगर निगम क्षेत्र में कुल 8,97,936 मतदाता हैं, जो इस बार महापौर के भाग्य का फैसला करेंगे। इतने बड़े मतदाता वर्ग के कारण चुनावी गणित और भी जटिल हो गया है। मतदाता अब सिर्फ पार्टी के नाम पर नहीं, बल्कि प्रत्याशी की छवि, काम करने की क्षमता और स्थानीय मुद्दों को ध्यान में रखकर फैसला करने के मूड में नजर आ रहे हैं।
शहर में बुनियादी सुविधाएं, सड़क, जलापूर्ति, कचरा प्रबंधन, ट्रैफिक और प्रदूषण जैसे मुद्दे इस चुनाव में प्रमुख रहने वाले हैं। मतदाता यह भी देखना चाहते हैं कि कौन सा प्रत्याशी वास्तव में धनबाद के विकास का स्पष्ट रोडमैप लेकर आ रहा है।
जीत के दावे और सियासी शोर
चुनाव की घोषणा से पहले ही कई प्रत्याशी अपने-अपने जीत के दावे करने लगे हैं। सोशल मीडिया से लेकर चौक-चौराहों तक राजनीतिक चर्चाओं का बाजार गर्म है। हर उम्मीदवार खुद को सबसे मजबूत बता रहा है, लेकिन असली तस्वीर तो मतदान के दिन ही साफ होगी।
कुल मिलाकर, धनबाद का यह निकाय चुनाव सिर्फ एक औपचारिक चुनाव नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिष्ठा, संगठनात्मक ताकत और व्यक्तिगत प्रभाव का बड़ा इम्तिहान साबित होने वाला है। दलीय समर्थन, बागी प्रत्याशी, पुराने दिग्गज और नए चेहरों की मौजूदगी ने मुकाबले को बेहद रोचक बना दिया है। अब देखना यह है कि जनता किस पर भरोसा जताती है और कौन धनबाद की महापौर की कुर्सी तक पहुंचने में कामयाब होता है।
