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धनबाद नगर निकाय चुनाव: अनारक्षित सीट ने बढ़ाया सियासी तापमान, नए–पुराने दिग्गजों के बीच दिलचस्प मुकाबले के आसार

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POOJA RAI/ DHANBAD

धनबाद नगर निकाय चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी अब अपने चरम पर पहुंचती दिख रही है। जैसे ही महापौर पद को अनारक्षित घोषित किया गया, वैसे ही राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई। अनारक्षित सीट ने उन चेहरों के लिए भी दरवाजे खोल दिए हैं, जो अब तक आरक्षण के कारण चुनावी दौड़ से बाहर थे। नतीजा यह है कि इस बार धनबाद में महापौर की कुर्सी के लिए मुकाबला बेहद दिलचस्प, बहुकोणीय और सियासी दृष्टि से बेहद अहम हो गया है।

अब तक मिली जानकारी के अनुसार, महापौर पद के लिए करीब 35 प्रत्याशियों ने नामांकन पत्र खरीदे हैं। इस लंबी सूची में दो पूर्व महापौर, कई वरिष्ठ राजनीतिक चेहरे, भाजपा से जुड़े कई नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, उद्योगपति और कुछ ऐसे नए नाम भी शामिल हैं, जिन्हें आम जनता अब तक सीधे तौर पर राजनीति में सक्रिय रूप से नहीं जानती थी। यही वजह है कि इस बार का चुनाव केवल राजनीतिक दलों की प्रतिष्ठा का सवाल नहीं, बल्कि जनता के भरोसे और नेतृत्व के चयन की असली परीक्षा बनने जा रहा है।

पुराने दिग्गज बनाम नए चेहरे

धनबाद की राजनीति में पूर्व महापौरों की मौजूदगी इस चुनाव को और भी रोचक बना रही है। एक ओर जहां अनुभव और प्रशासनिक समझ का दावा किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर जनता के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या पुराने चेहरे वास्तव में नए धनबाद की उम्मीदों पर खरे उतर पाएंगे। पिछले कार्यकालों की उपलब्धियां और कमियां दोनों ही इस चुनाव में चर्चा का विषय बन चुकी हैं।

वहीं, नए चेहरे विकास, पारदर्शिता और जमीनी जुड़ाव के मुद्दों को लेकर मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। जनता भी इस बार केवल नाम और पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि काम, सोच और सामाजिक योगदान के आधार पर फैसला करने के मूड में दिख रही है।

चर्चा के केंद्र में शांतनु चंद्रा

इन्हीं तमाम नामों के बीच एक नाम ऐसा है, जो फिलहाल चुनावी चर्चाओं के केंद्र में बना हुआ है—सफल उद्यमी और समाजसेवी शांतनु चंद्रा। भले ही उन्होंने अब तक आधिकारिक रूप से चुनाव लड़ने की घोषणा नहीं की हो, लेकिन सूत्रों की मानें तो उनके मैदान में उतरने की प्रबल संभावना है। यही संभावना कई संभावित प्रत्याशियों की धड़कनें बढ़ा रही है।

शांतनु चंद्रा को केवल एक उद्यमी के तौर पर नहीं, बल्कि एक जमीनी समाजसेवी के रूप में भी जाना जाता है। कोरोना काल में जब आम लोग डर और असहायता के माहौल में थे, उस समय उन्होंने निस्वार्थ भाव से जरूरतमंदों की मदद की। राशन वितरण से लेकर स्वास्थ्य सहायता, और वृद्धा आश्रम व अनाथ आश्रम में सेवा कार्य—उनका सामाजिक योगदान शहर में आज भी लोगों की जुबान पर है।

दलित वर्ग में मजबूत पकड़

शांतनु चंद्रा की संभावित उम्मीदवारी का सबसे बड़ा राजनीतिक आधार दलित और शोषित वर्ग माना जा रहा है। निकाय चुनाव में आरक्षण नीति के खिलाफ जब उन्होंने दलित वर्ग का नेतृत्व करते हुए सरकार के फैसले को चुनौती दी और न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, तब उन्होंने एक बड़े वर्ग का भरोसा जीता। यह कदम उन्हें सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले प्रतिनिधि के रूप में स्थापित करता है।

धनबाद की जनसंख्या संरचना पर नजर डालें तो यहां दलित वर्ग की संख्या काफी प्रभावशाली मानी जाती है। ऐसे में यदि शांतनु चंद्रा चुनावी मैदान में उतरते हैं, तो इस वर्ग का सीधा समर्थन उन्हें मिल सकता है। यही समर्थन कई स्थापित प्रत्याशियों के गणित को बिगाड़ने की क्षमता रखता है।

भाजपा से जुड़ाव और संगठनात्मक लाभ

इसके अलावा, शांतनु चंद्रा का भाजपा से सक्रिय जुड़ाव भी उनके पक्ष में जाता दिख रहा है। भले ही नगर निकाय चुनाव गैर-दलीय आधार पर हो रहे हों, लेकिन यह किसी से छिपा नहीं है कि राजनीतिक दल अपने-अपने समर्थित प्रत्याशियों को पूरी ताकत से सहयोग देते हैं। भाजपा का मजबूत संगठनात्मक ढांचा, कार्यकर्ताओं का नेटवर्क और मतदाताओं में पकड़—इन सभी का लाभ शांतनु चंद्रा को मिलने की संभावना जताई जा रही है।

हालांकि, भाजपा के भीतर भी कई दावेदार मैदान में हैं, ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी का झुकाव किस ओर जाता है और अंदरूनी समीकरण किस तरह आकार लेते हैं।

राजनीतिक विरासत और अनुभव

शांतनु चंद्रा की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी चर्चा में है। उनके चाचा बिहार सरकार में मंत्री रह चुके हैं, जिससे यह कहा जा सकता है कि राजनीति उन्हें विरासत में मिली है। हालांकि, मौजूदा दौर की राजनीति में केवल विरासत ही काफी नहीं होती। जनता अब काम और नीयत को ज्यादा महत्व देती है। बावजूद इसके, राजनीतिक समझ, प्रशासनिक अनुभव और सत्ता के गलियारों की जानकारी उन्हें अन्य प्रत्याशियों की तुलना में एक कदम आगे रख सकती है।

चुनावी समीकरण और संभावनाएं

अगर शांतनु चंद्रा चुनावी मैदान में उतरते हैं, तो मुकाबला सीधा-सीधा नहीं रहेगा। वोटों का बंटवारा, वर्गीय समर्थन, संगठनात्मक ताकत और व्यक्तिगत छवि—इन सभी का असर परिणाम पर पड़ेगा। कई प्रत्याशियों के लिए यह चुनाव आसान नहीं रहने वाला, खासकर उनके लिए जो अब तक खुद को मजबूत दावेदार मान रहे थे।

धनबाद की जनता इस बार महज वादों से संतुष्ट नहीं होने वाली। सड़क, पानी, सफाई, ट्रैफिक, रोजगार और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे इस चुनाव में निर्णायक साबित होंगे। ऐसे में जनता ऐसे नेतृत्व की तलाश में है, जो न सिर्फ विकास की बात करे, बल्कि उसे जमीन पर उतारने की क्षमता भी रखता हो।

सूत्रों की मानें तो यदि जनता शांतनु चंद्रा को अपना प्यार और स्नेह देती है, तो धनबाद में विकास की एक नई गाथा लिखी जा सकती है। फिलहाल, सबकी निगाहें उनके अगले कदम पर टिकी हैं। क्या वह चुनावी रण में उतरेंगे या नहीं—इस सवाल का जवाब आने वाले दिनों में धनबाद की सियासत की दिशा तय करेगा।

कुल मिलाकर, धनबाद नगर निकाय चुनाव इस बार केवल एक चुनाव नहीं, बल्कि नेतृत्व, सामाजिक न्याय और विकास के विज़न की असली लड़ाई बन चुका है। आने वाले दिन यह तय करेंगे कि जनता अनुभव को चुनेगी या बदलाव को।

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